
दावणगेरे. श्री सुपाश्र्वनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ में आयोजित विशाल धर्मसभा में आचार्य राजरक्षितसूरि ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सद्गुरु का सत्संग आत्मा को ऊध्र्वगति, आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर ले जाने का सबसे प्रभावी साधन है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक कुशल शिल्पकार अनगढ़ पत्थर को दिव्य प्रतिमा का स्वरूप प्रदान करता है, उसी प्रकार सद्गुरु का सत्संग साधारण मनुष्य को महान व्यक्तित्व तथा पापी जीव को परमात्मा बनने की दिशा देता है। आचार्य ने कहा कि सत्संग आत्मगुणों का विकास करता है, जबकि कुसंग व्यक्ति के संस्कारों और चरित्र का विनाश कर देता है। इसलिए जीवन में सदैव श्रेष्ठ संगति का चयन करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे एक सड़ा हुआ फल पूरी टोकरी को प्रभावित कर देता है, उसी प्रकार एक कुमित्र पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। ताली बजाने वाले, प्रशंसा करने वाले, साथ भोजन करने वाले और साथ समय बिताने वाले मित्र तो अनेक मिल जाते हैं, लेकिन जीवन को कल्याण के मार्ग पर ले जाने वाला ‘कल्याण मित्र’ अत्यंत दुर्लभ होता है। अपने प्रवचन में आचार्य ने वज्रकुमार के प्रेरक जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि पूर्वजन्म में वैश्रमण देव रहे वज्रकुमार ने अष्टापद तीर्थ पर प्रथम गणधर गौतम स्वामी के सत्संग का लाभ प्राप्त किया। जिनवाणी के प्रभाव से उन्होंने संयम और दीक्षा के प्रति गहरी श्रद्धा विकसित की, जिसका परिणाम यह हुआ कि अगले जन्म में मात्र तीन वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने धर्म प्रचार और असंख्य जीवों के आध्यात्मिक उत्थान का कार्य किया।