हमें अपने डेटा सेंटर्स की संख्या बढ़ानी होगी और निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होगा। देश के सर्वश्रेष्ठ एआइ रिसर्चर अक्सर अमरीका चले जाते हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की वैश्विक दौड़ में भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की हालिया रिपोर्ट भारत को ग्लोबल एआइ इंडेक्स में तीसरे स्थान पर दिखाती है, जो सुनने में बहुत सुखद है। लेकिन संभावनाओं के साथ-साथ गंभीर चुनौतियों की एक लंबी फेहरिस्त भी सामने आती है। भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा टैलेंट पूल और लगभग 96 करोड़ का विशाल इंटरनेट यूजर बेस है, फिर भी एआइ सुपरपावर बनने का रास्ता कांटों भरा है। भारत की सबसे बड़ी चुनौती इसकी शिक्षा व्यवस्था और डिग्री-कल्चर है। हर साल लाखों विद्यार्थी स्नातक होकर निकल रहे हैं, लेकिन उनमें से आधे से ज्यादा के पास केवल कागज की डिग्री है। उनके पास एआइ जैसी जटिल तकनीक पर काम करने के लिए आवश्यक व्यावहारिक कौशल नहीं है।
जब तक हमारा टैलेंट 'एम्प्लॉयबल' यानी रोजगार योग्य नहीं होगा, तब तक हम तकनीक के निर्माता नहीं, केवल उपभोक्ता बने रहेंगे। दूसरी बड़ी बाधा बुनियादी ढांचे की है। आज भी भारत के पास अपना कोई सशक्त स्वदेशी एआइ प्लेटफॉर्म नहीं है। हम डेटा के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर हैं। एक-चौथाई इंटरनेट यूजर्स केवल मनोरंजन या कंटेंट देखने के लिए इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं, जिनका रचनात्मक या तकनीकी योगदान नगण्य है। डेटा सेंटर की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। भारत में अभी लगभग 153 डेटा सेंटर ही हैं, जबकि अमरीका में यह संख्या 5,427 और चीन में 449 है। जाहिर है बिना मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के डेटा की सुरक्षा और एआइ का विकास असंभव है। निवेश के मामले में भी हम काफी पीछे हैं। भारत में निजी निवेश जहां 200 करोड़ डॉलर के आसपास है, वहीं अमरीका 10,000 करोड़ डॉलर के भारी-भरकम निवेश के साथ नेतृत्व कर रहा है। चीन भी 1,200 करोड़ डॉलर के साथ हमसे कहीं आगे है। भारत को अगर वाकई एआइ सुपरपावर बनना है, तो केवल यूजर बेस के भरोसे नहीं रहा जा सकता। हमें अपने डेटा सेंटर्स की संख्या बढ़ानी होगी और निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होगा। देश के सर्वश्रेष्ठ एआइ रिसर्चर अक्सर अमरीका चले जाते हैं। टैलेंट को रोकना उतना ही जरूरी है, जितना नए टैलेंट तैयार करना। अमरीका इनोवेशन पर, चीन नियंत्रण और यूरोप रेगुलेशन पर जोर दे रहा है। ऐसे में भारत को इनोवेशन और रेगुलेशन के बीच संतुलित नीति बनानी होगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन कर डिग्री धारकों के बजाय कुशल विशेषज्ञों की एक फौज तैयार करनी होगी।हकीकत तो यह है कि भारत में एआइ का भविष्य केवल अंग्रेजी बेस्ड मॉडल पर नहीं बनेगा। हमें भारतीय भाषाओं पर भी काम करना होगा। जाहिर है यदि बुनियादी ढांचे व टैलेंट पर प्रभावी तौर पर काम नहीं हुआ तो तकनीक की लहर में हम केवल पिछलग्गू बनकर रह जाएंगे।