जयपुर

संपादकीय : नारी शक्ति वंदन को लेकर फिर टकराव चिंताजनक

प्रस्तावित संशोधन विधेयक में लोकसभा की मौजूदा संख्या 543 को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। सीटों की संख्या तय करने के लिए परिसीमन का प्रस्ताव है।

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Apr 17, 2026

एक बार जब सभी राजनीतिक दल महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने के पक्षधर हैं, तो फिर बीते तीन दशकों से हो रहे प्रयासों के बावजूद इस मुद्दे पर बार-बार नई बाधाएं क्यों पैदा हो जाती हैं? देश के राजनेताओं के दिमाग में भले ये सवाल नहीं आता हो, लेकिन देश के करोड़ों लोगों को सालों से इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी व मनमोहन सिंह की सरकारों में भी अनेक मौके आए, जब लगा कि महिला आरक्षण की आस अब पूरी होने वाली है, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी।

देश की संसद महिला आरक्षण को लेकर 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पहले ही पारित कर चुकी है। चिंताजनक तथ्य यह है कि संसद में गुरुवार से शुरू हुए तीन दिवसीय विशेष सत्र में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन संशोधन विधेयकों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में एक बार फिर टकराव शुरू हो गया है। प्रस्तावित संशोधन विधेयक में लोकसभा की मौजूदा संख्या 543 को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। सीटों की संख्या तय करने के लिए परिसीमन का प्रस्ताव है। विपक्ष महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में तो है, लेकिन 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किए जाने के विरोध में है। विपक्ष का तर्क है कि महिला आरक्षण मौजूदा 543 सीटों के आधार पर ही किया जाए। संसद में नए संशोधन विधेयक पर पक्ष-विपक्ष के बीच हुई तीखी नोकझोंक से स्पष्ट है कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार का साथ देने को तैयार नहीं है। उसका तर्क है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बीच संसद का विशेष सत्र सरकार की हड़बड़ी का परिचायक है। कहने को हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं, लेकिन संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर हमारा ग्राफ बहुत नीचे है। वर्तमान संसद में 543 में से सिर्फ 75 महिला सांसद हैं, यानी 15 फीसदी से भी कम ! पाकिस्तान और बांग्लादेश भी इस मामले में हमसे काफी आगे हैं। दुनिया के चार देशों की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50त्न से अधिक है। संसद में पक्ष-विपक्ष के टकराव को देखते हुए संशोधन विधेयकों को लेकर संशय नजर आता है। ये विधेयक संसद में वोट डालने वाले सांसदों के दो तिहाई बहुमत से पारित होंगे। सरकार को इन्हें पारित करने के लिए विपक्ष को मनाना होगा। महिलाओं को आरक्षण मिले, यह सब चाहते हैं, तो फिर टकराव के मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास क्यों नहीं किए जाने चाहिए?

देश को यह नहीं लगना चाहिए कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर राजनीतिक दल अपनी स्वार्थ वाली सोच से ऊपर नहीं उठ पा रहे। संशोधन विधेयकों को पारित करना सरकार की जिम्मेदारी है, लिहाजा इस मुद्दे पर उसे विपक्ष को विश्वास में लेना चाहिए, ताकि ये संदेश जा सके कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम राजनीति की विचारधाराओं से एकदम परे है। ए क बार जब सभी राजनीतिक दल महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने के पक्षधर हैं, तो फिर बीते तीन दशकों से हो रहे प्रयासों के बावजूद इस मुद्दे पर बार-बार नई बाधाएं क्यों पैदा हो जाती हैं? देश के राजनेताओं के दिमाग में भले ये सवाल नहीं आता हो, लेकिन देश के करोड़ों लोगों को सालों से इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी व मनमोहन सिंह की सरकारों में भी अनेक मौके आए, जब लगा कि महिला आरक्षण की आस अब पूरी होने वाली है, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी।

देश की संसद महिला आरक्षण को लेकर 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पहले ही पारित कर चुकी है। चिंताजनक तथ्य यह है कि संसद में गुरुवार से शुरू हुए तीन दिवसीय विशेष सत्र में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन संशोधन विधेयकों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में एक बार फिर टकराव शुरू हो गया है। प्रस्तावित संशोधन विधेयक में लोकसभा की मौजूदा संख्या 543 को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। सीटों की संख्या तय करने के लिए परिसीमन का प्रस्ताव है। विपक्ष महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में तो है, लेकिन 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किए जाने के विरोध में है। विपक्ष का तर्क है कि महिला आरक्षण मौजूदा 543 सीटों के आधार पर ही किया जाए। संसद में नए संशोधन विधेयक पर पक्ष-विपक्ष के बीच हुई तीखी नोकझोंक से स्पष्ट है कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार का साथ देने को तैयार नहीं है। उसका तर्क है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बीच संसद का विशेष सत्र सरकार की हड़बड़ी का परिचायक है। कहने को हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं, लेकिन संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर हमारा ग्राफ बहुत नीचे है। वर्तमान संसद में 543 में से सिर्फ 75 महिला सांसद हैं, यानी 15 फीसदी से भी कम ! पाकिस्तान और बांग्लादेश भी इस मामले में हमसे काफी आगे हैं। दुनिया के चार देशों की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50त्न से अधिक है। संसद में पक्ष-विपक्ष के टकराव को देखते हुए संशोधन विधेयकों को लेकर संशय नजर आता है। ये विधेयक संसद में वोट डालने वाले सांसदों के दो तिहाई बहुमत से पारित होंगे। सरकार को इन्हें पारित करने के लिए विपक्ष को मनाना होगा। महिलाओं को आरक्षण मिले, यह सब चाहते हैं, तो फिर टकराव के मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास क्यों नहीं किए जाने चाहिए? देश को यह नहीं लगना चाहिए कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर राजनीतिक दल अपनी स्वार्थ वाली सोच से ऊपर नहीं उठ पा रहे। संशोधन विधेयकों को पारित करना सरकार की जिम्मेदारी है, लिहाजा इस मुद्दे पर उसे विपक्ष को विश्वास में लेना चाहिए, ताकि ये संदेश जा सके कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम राजनीति की विचारधाराओं से एकदम परे है।

Published on:
17 Apr 2026 02:45 pm
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