
कोप्पल. तेरापंथ भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि अनंत कुमार ने कहा कि प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार है, लेकिन कर्मों का आवरण इस दिव्य अनुभूति में सबसे बड़ी बाधा बनता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मंच पर पर्दा हटने के बाद ही कलाकार दिखाई देता है, उसी प्रकार कर्मों का आवरण हटे बिना आत्मदर्शन संभव नहीं है। मुनि ने कहा कि प्रत्येक आत्मा आठ प्रकार के कर्मों से बंधी होती है, जिनमें मोहनीय कर्म सबसे अधिक बंधनकारी है। यही कर्म व्यक्ति को राग-द्वेष, क्रोध, अहंकार, माया, लोभ, ईष्र्या और कामनाओं में उलझाकर आत्मकल्याण के मार्ग से दूर कर देता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे जंग लगे लोहे को पारस पत्थर भी स्वर्ण नहीं बना सकता, उसी प्रकार कषायों से आच्छादित आत्मा भी आत्मसाक्षात्कार नहीं कर सकती। जब तक भीतर का जंग अर्थात् कषाय दूर नहीं होगा, तब तक आत्मिक उन्नति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम, तप और कषायों के क्षय का सर्वोत्तम अवसर है।प्रारंभ में मुनि जैनम कुमार ने जीवन को निरंतर शुभयोग में रखने के व्यावहारिक सूत्र बताए। कार्यक्रम के अंत में जीरावाला परिवार की महिलाओं ने अपने निवास पर मुनि मंडल के आगमन पर सुमधुर मंगलगीत प्रस्तुत कर भावपूर्ण स्वागत किया।