जयपुर

टकराव में उलझ गई महाशक्ति संसाधनों से बाजी मार गया ड्रेगन

चीन के ऊर्जा मिश्रण में तेल और गैस का अनुपात कम है, जबकि कोयला अब भी एक प्रमुख विकल्प है।

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Apr 10, 2026

हर्ष काबरा वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक - वैश्विक अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाने वाली 39 दिनों की बेनतीजा जंग आखिरकार ईरान और अमरीका के बीच दो हफ्तों के अस्थायी विराम पर आकर थमी है। आधी सदी से सुलग रहे सभ्यतागत टकराव सांस भर की मोहलत में सुलझते नहीं, टलते हैं। इस युद्ध से किसी भी पक्ष को अनिश्चितताओं के अलावा कुछ हासिल होता नहीं दिख रहा। डॉनल्ड ट्रंप भले ही 'बड़े पैसे' और 'स्वर्ण युग' के सपने बेच रहे हों, मुनाफा दरअसल उस खिलाड़ी के खाते में जाने वाला है, जो मैदान में उतरा ही नहीं-चीन।

युद्ध के आरंभ में अमरीकी हमले को चीन की ऊर्जा सुरक्षा को पस्त करने की सामरिक बिसात भी बताया गया था। लेकिन यह दावा कि वेनेजुएला और ईरान का पतन चीन को तेल के महत्वपूर्ण स्रोतों से वंचित कर उसकी कमर तोड़ देगा या उसके गठबंधनों को खोखला कर देगा, सुनने में जितना लुभावना है, यथार्थ में उतना ही भ्रामक। कई मायनों में यह हमला चीन को मजबूत कर उसे पश्चिमी वर्चस्व के लिए बड़ी चुनौती बना रहा है। ईरान और वेनेजुएला के कच्चे तेल पर चीन की निर्भरता को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, हालांकि चीन का मात्र 17 प्रतिशत आयातित तेल ही वहां से आता है। सच यह है कि ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, विशाल तेल भंडार बनाने तथा असुरक्षित आपूर्ति मार्गों पर निर्भरता घटाने की रणनीति ने चीन को आपूर्ति संकटों के खिलाफ भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातकों से कहीं अधिक सुदृढ़ बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतिस्पर्धियों का चोट खाना भी एक तरह की जीत ही होती है। भले ही चीन का आधा कच्चा तेल और एक-तिहाई गैस खाड़ी से आते हैं, पिछले कुछ वर्षों में चीन ने नौसैनिक नाकेबंदी से सुरक्षित 16,000 किलोमीटर लंबी जमीनी पाइपलाइनें बिछाई हैं और अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को राष्ट्रीय ग्रिड के 60 प्रतिशत के पार पहुंचाया है। चीन के पास एक अरब 40 करोड़ बैरल, यानी करीब 120 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार रहता है, जो अहम समुद्री मार्गों के अवरुद्ध होने पर भी अर्थव्यवस्था को महीनों तक निर्बाध रखने के लिए पर्याप्त है।

चीन के ऊर्जा मिश्रण में तेल और गैस का अनुपात कम है, जबकि कोयला अब भी एक प्रमुख विकल्प है। कोयले को पूरी तरह जलाए बिना उसे स्वच्छ ईंधन गैस में तब्दील करने की उन्नत तकनीक में निवेश कर चीन ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत बना लिया है। चीनी सरकार अपने तेल शोधन संयंत्रों को सीधे फरमान देने, निर्यात तत्काल प्रतिबंधित करने और आंतरिक आपूर्ति शृंखला के कड़े प्रबंधन की क्षमता रखती है। यही नियंत्रण प्रशासन को बाजार की अफरा-तफरी रोकने और कीमतें स्थिर रखने के असीमित अधिकार भी देता है। इसी वजह से वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी चीन में नागरिक असंतोष या आर्थिक हाहाकार के संकेत अमूमन दिखाई नहीं देते।

चीन पहले ही सौर उपकरण, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहनों और हरित प्रौद्योगिकियों के निर्माण में अग्रणी है। कई देशों में चीन के ऊर्जा उत्पाद अस्थिर ग्रिड बिजली की जगह ले रहे हैं। ऊर्जा संकट की मार झेल रहे देश अब आयातित जीवाश्म ईंधन के बजाय सस्ते विकल्पों की ओर रुख करने को मजबूर हैं, जिससे बीजिंग का आर्थिक प्रभाव और पुख्ता होगा। युद्ध में उतरे बिना ही चीन इस संघर्ष से आधुनिक युद्ध कौशल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, समन्वित ड्रोन हमलों आदि से जुड़े महत्वपूर्ण सैन्य सबक ले रहा है। चीनी नियंत्रण वाले संसाधनों की मांग तेज हो रही है। युद्ध के शुरुआती 96 घंटों में ही 900 से अधिक मिसाइलों की खपत ने दुनिया की कुल वार्षिक मिसाइल उत्पादन क्षमता को पछाड़ दिया था। अमरीकी शस्त्रागार की पूर्ति उसकी वर्तमान औद्योगिक क्षमता से करना लगभग असंभव है। यह स्थिति चीन की विशाल विनिर्माण क्षमताओं को निर्णायक बनाती है। अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के लिए आवश्यक गैलियम, नियोडिमियम और सैमरियम जैसे दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण पर चीन का दबदबा है। परिष्कृत गैलियम की 88 प्रतिशत वैश्विक आपूर्ति अकेले चीन के नियंत्रण में है। यानी अमरीका अपने शस्त्रागार की भरपाई के लिए भी चीन पर ही निर्भर होगा। चीन ने बेहतर सौदेबाजी के लिए दवाओं, सेमीकंडक्टर चिप्स तथा आपूर्ति शृंखलाओं में भी बाधाएं खड़ी कर रखी हैं। वैश्विक अस्थिरता सरकारों को ऊर्जा और सुरक्षा की चिंताओं में इस कदर उलझा रही है कि वे चीन की व्यापारिक नीतियों को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं। वाशिंगटन की धूमिल होती छवि के चलते बीजिंग खुद को एक जिम्मेदार और स्थिर शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

महंगा तेल चीन की औद्योगिक लागत बढ़ाता तो है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पूर्ण लाभ नहीं, बल्कि सापेक्षिक लाभ ही अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसमें लगभग हर पैमाने पर बीजिंग का पलड़ा भारी प्रतीत हो रहा है। अमरीका की बेनकाब होती कमजोरियों के बीच ही चीन उन संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है जो भावी विश्वव्यवस्था की सेहत तय करेंगे। यदि वाकई ईरान हमले का एक मकसद चीन को घेरना था, तो ट्रंप की यह एक और विफलता ही कही जानी चाहिए कि अंतत: चीन बिना लड़े ही सबसे बड़ा विजेता बनकर उभर रहा है।

Published on:
10 Apr 2026 04:10 pm
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