
अष्टानिका पर्व के सिद्धचक्र महामंडल विधान में मुनियों का संदेश
श्रद्धा, सेवा और पारिवारिक मूल्यों से मिलता है सुख-शांति
देवली. महावीर मंदिर में अष्टानिका पर्व के तहत आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान में शुक्रवार को मुनि सुप्रभ सागर महाराज एवं मुनि वैराग्य सागर महाराज ने सम्यक दर्शन, सेवा, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों पर प्रेरणादायी प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि जीवन में बाहरी रूप नहीं, बल्कि आत्मा के गुण, श्रद्धा, सेवा और संस्कार ही वास्तविक सुख-शांति का आधार हैं।
मुनि सुप्रभ सागर ने निर्विचिकित्सा अंग की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म, धर्म-क्रिया और धर्मात्माओं के प्रति कभी भी ग्लानि का भाव नहीं रखना चाहिए। सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति शरीर नहीं, बल्कि उसमें विद्यमान आत्मा और उसके गुणों को देखता है। उन्होंने कहा कि शरीर पंचतत्वों से निर्मित और नश्वर है, जबकि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके सद्गुणों से होती है।
मुनि वैराग्य सागर ने कहा कि भौतिक सुविधाओं की बढ़ोतरी के बावजूद लोगों के जीवन से शांति समाप्त होती जा रही है, जिसका प्रमुख कारण श्रद्धा और संस्कारों का अभाव है। उन्होंने कहा कि परिवारों में बढ़ते विवाद और तलाक की घटनाओं के पीछे घर के अनुभवी बड़े-बुजुर्गों की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। परिवार को जोड़े रखने के लिए घर में ऐसे समझदार सदस्य का होना जरूरी है, जो मतभेदों को समय रहते सुलझा सके।प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मोपदेश का श्रवण किया और सिद्धचक्र महामंडल विधान की पूजा-अर्चना में भाग लिया।
देवली. प्रवचन देते मुनि सुप्रभ सागर महाराज तथा विधान पूजन के दौरान भक्ति नृत्य करती श्रद्धालु महिलाएं।