
संजय कौशिक / जयपुर. नवीकृत ऊर्जा उत्पादन और पर्यटन विकास के नजरिए से भले ही पश्चिमी राजस्थान के जिले देश और प्रदेश में सिरमौर हों, लेकिन रेलवे के लिए शायद ये मायने नहीं रखता। हालात यह हैं कि इस क्षेत्र के कई जिलों में आज भी रेल का सफर पुरातनकालीन सिंगल ट्रैक पर आधारित है।
उत्तर-पश्चिम रेलवे में वर्ष 2008 के बाद से रेल लाइनों के दोहरीकरण का कार्य शुरू हुआ। रेवाड़ी-अलवर, जयपुर-अजमेर, पालनपुर-रेवाड़ी समेत कई व्यस्ततम रेल लाइनों के दोहरीकरण के कार्य हुए। इनमें ट्रेनें डबल ट्रेक पर दौड़ रही हैं, लेकिन मेड़ता से बीकानेर वाया नागौर, जोधपुर से बाड़मेर, जोधपुर से जैसलमेर, जोधपुर से मारवाड़ जंक्शन रेल लाइनों पर आज भी डबल ट्रैक का इंतजार ही चल रहा है।
इनमें कई जिलों से रेलवे को पत्थर, सीमेंट, जिप्सम इत्यादि की ढुलाई से सालाना करोड़ों रुपए का राजस्व मिल रहा है। लेकिन बेहतर कनेक्टिविटी और बेहतर यात्री सुविधाओं के लिए रेलवे यहां कोई प्रयास करता नहीं दिख रहा।
जयपुर से जोधपुर के बीच इस साल के अंत तक
रेलवे अधिकारियों की मानें तो, वर्तमान में जयपुर से जोधपुर के बीच दोहरीकरण का कार्य वर्तमान में चल रहा है। इसे डेगाना-मेड़ता रोड, खारिया खंगार व डेगाना से बोरावड़ के बीच दोहरीकरण का काम हो चुका है। बोरावड़ से फुलेरा व खारिया खंगार से राईकाबाग तक भी यह कार्य विभिन्न चरणों में चल रहा है। इसके पूरे होने के बाद कुछ हद तक राहत मिल सकेगी। हालांकि अभी इस संपूर्ण काम को पूरा होने में करीब आठ महीने और लगेंगे।
विद्युतीकरण में भी देरी
रेलवे अधिकारियों के अनुसार जहां दोहरीकरण का कार्य चल रहा है। वहां विद्युतीकरण का कार्य भी तेजी से चल रहा है, लेकिन जहां अभी इसका काम शुरू नहीं हुआ। वहां इसके लिए इंतजार और करना पड़ेगा।
स्वीकृति फिर भी इंतजार
इधर, केंद्र सरकार अजमेर से चित्तौडगढ़़ के बीच रेल लाइन के दोहरीकरण को स्वीकृति दे चुकी है, लेकिन अभी भी इसका काम शुरू नहीं हो सका है। इस बार इसके लिए एक करोड़ रुपए ही बजट आवंटित किया गया है। इसी प्रकार जयपुर से सवाईमाधोपुर के बीच दोहरीकरण के लिए भी इस बार एक करोड़ रुपए ही बजट मिला है।
यों हो रही दिक्कत
दोहरीकरण न होने से ट्रेनों का संचालन प्रभावित हो रहा है। कई बार तेज गति में दौडऩे वाली ट्रेनें भी छोटे स्टेशन व आउटर पर खड़ी नजर आती हैं। इससे यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचने में भी देरी होती है। साथ ही ईंधन की भी बर्बादी होती है।
अकेले जैसलमेर से हर साल हजार करोड़ों की कमाई
देश-दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर जैसलमेर आकर्षक डेस्टिनेशंस में से एक है। हर साल देश और विदेश से आठ लाख से अधिक सैलानी यहां आते हैं। यहां के पर्यटन व्यवसाय में तकरीबन 1200 करोड़ रुपए सालाना से अधिक राशि का टर्नओवर है।
देश का सोलर पावर हाउस
राजस्थान में हाल ही मिले औद्योगिक निवेश प्रस्तावों में सर्वाधिक करीब तीन लाख करोड़ रुपए के प्रस्ताव अकेले रिन्युएबल एनर्जी में मिले हैं। जहां जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर समेत पश्चिमी राजस्थान में निवेशकों ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अपने प्रोजेक्ट लगाने के वादे किए हैं।
सेना के लिए सबसे जरूरी
इन जिलों से भारत-पाक की सीमा लगती है। यहां सेना की चौकसी रहती है। जिससे यहां रेल से पलटन की आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में इस क्षेत्र में सामरिक दृष्टि से भी दोहरीकरण जरूरी है। इसको लेकर रेलवे को ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
जोन में इन रेल लाइनों पर हो चुका दोहरीकरण
-वर्ष 2008-09 में जयपुर-फुलेरा (54.75 किमी.) रेलमार्ग।
-वर्ष 2010-11 में फुलेरा-अजमेर (80.20 किमी), दौसा-बांदीकुई (28.88 किमी.) रेलमार्ग।
-वर्ष 2011-12 में अलवर-हरसौली (34.86 किमी.) रेलमार्ग।
-वर्ष 2012-13 में हरसौली-अनाज मंडी (37.45 किमी.) रेलमार्ग।
-वर्ष 2015-16 में केशवगंज-स्वरूपगंज (24.48 किमी.), मोरीबेड़ा-केशवगंज (21.38 किमी.), सोजत रोड- मारवाड़ (20.86 किमी.), गुडिय़ा-चंडावल (10.25 किमी) रेलमार्ग, रानी- मोरीबेड़ा (40.16 किमी.), भीनवलिया-मारवाड़ (24 किमी.), अजमेर-दौराई (8.43 किमी.) रेलमार्ग।
-वर्ष 2021 में रेवाड़ी-पालनपुर (716 किमी) रेल लाइन का संपूर्ण दोहरीकरण।
-फु लेरा-डेगाना व डेगाना-राईकाबाग रेल खंडों पर विभिन्न चरणों में कार्य प्रगति पर है।