जैसलमेर

jaisalmer: पार्षद चुनेंगे सत्ता, लेकिन असली मुकाबला सभापति की कुर्सी का

नगर परिषद चुनाव में 45 वार्डों की लड़ाई सिर्फ पार्षद चुनने तक सीमित नहीं रहेगी। चुनाव परिणाम के बाद 23 पार्षदों का आंकड़ा सत्ता की चाबी तय करेगा। ऐसे में 1-2 निर्दलीय पार्षद भी सभापति चुनाव में पूरे राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
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Aug 23, 2026
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जैसलमेर. नगर परिषद चुनाव का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 45 वार्डों में कौन पार्षद बनेगा। असली राजनीतिक कहानी उसके बाद शुरू होगी। मतदाता वार्ड का प्रतिनिधि चुनेंगे, लेकिन निर्वाचित पार्षदों की संख्या तय करेगी कि नगर परिषद की कमान किस राजनीतिक खेमे के हाथ जाएगी। राजस्थान में 2026 के निकाय चुनाव में पहले पार्षदों का चुनाव होगा और इसके बाद नगर परिषद सभापति का निर्वाचन निर्वाचित पार्षद करेंगे। यानी मतदाता सीधे सभापति नहीं चुनेंगे। जैसलमेर में 45 वार्ड होने के कारण निर्वाचित सदस्यों के बीच स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा 23 बनता है। यही वजह है कि किसी पार्टी को 22 सीटें मिलने पर भी सत्ता का गणित खत्म नहीं होगा और 1-2 निर्दलीय पार्षद पूरे बोर्ड की दिशा बदल सकते हैं।

वार्ड की जीत से बड़ा सवाल बनेगा बोर्ड किसके नियंत्रण में आएगा

चुनाव मैदान में भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशी अपने-अपने वार्ड जीतने की कोशिश करेंगे, लेकिन पार्टी संगठन की नजर सीटों के कुल आंकड़े पर रहेगी। एक पार्टी 20-22 सीटों तक पहुंचती है और दूसरी भी बहुमत से दूर रहती है, तो मुकाबला मतदान खत्म होने के बाद भी जारी रह सकता है। यहीं से व्यक्तिगत रिश्ते, स्थानीय प्रभाव, निर्दलीय पार्षद और राजनीतिक बातचीत महत्वपूर्ण हो जाएंगे।

सत्ता का संभावित गणित

- 23 या अधिक सीटें: बहुमत के साथ सभापति चुनाव में स्थिति मजबूत इस बार

- 20-22 सीटें: बहुमत से कम, लेकिन सत्ता बनाने की संभावना कायम

- निर्दलीयों की निर्णायक संख्या: दोनों प्रमुख दलों के लिए बातचीत का दौर

- करीबी आंकड़ा: एक-एक पार्षद की राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है।

आरक्षण ने बदली रणनीति, अब टिकट से आगे सभापति की तैयारी

जैसलमेर नगर परिषद के सभापति पद को लेकर 2026 की उपलब्ध आरक्षण सूची में सामान्य वर्ग दर्ज है। वार्डों के आरक्षण में अलग-अलग श्रेणियों का वितरण होने से पार्टियों के सामने एक साथ दो स्तरों की रणनीति है—पहले जीतने योग्य उम्मीदवार उतारना और फिर ऐसा बोर्ड बनाना, जिसमें सभापति चुनाव के समय पर्याप्त समर्थन जुट सके। इसका मतलब यह है कि चुनावी टिकट अब केवल वार्ड जीतने का साधन नहीं रहेगा। मजबूत स्थानीय चेहरे को उतारना, संभावित सभापति सम निर्दलीय उम्मीदवारों को अक्सर वार्ड स्तर की चुनौती माना जाता है, लेकिन इस चुनाव में उनका महत्व परिणाम के बाद बढ़ सकता है। यदि दोनों प्रमुख दल बहुमत से दूर रहते हैं, तो निर्दलीय पार्षद किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं।

Updated on:
23 Aug 2026 08:54 pm
Published on:
23 Aug 2026 08:53 pm