जैसलमेर में करीब 35 वर्षों से बसी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की भील बस्ती आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है। बस्ती के सैकड़ों परिवार बिजली, पेयजल, सड़क और नालियों जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, जबकि बढ़ती आबादी के कारण आवास का संकट भी गहराता जा रहा है। सुरक्षित जीवन की उम्मीद लेकर भारत आए इन परिवारों के सामने अब सम्मानजनक जीवन और स्थायी पुनर्वास की चुनौती खड़ी है।

जैसलमेर. सीमावर्ती जैसलमेर जिले में हजारों की तादाद में पाकिस्तान से आए शरणार्थी शहर सहित ग्रामीण अंचलों में निवास कर रहे हैं। पाकिस्तान में उन्हें धर्म आधारित प्रताडऩाओं से लेकर अन्य सामाजिक-आर्थिक तकलीफों ने इतना सताया कि, वे मूल वतन में सुखी जीवन की आस लिए पहुंचे। यहां पर उन्हें निश्चित रूप से पाकिस्तान के मुकाबले सुरक्षित जीवन का अधिकार मिला लेकिन रोजमर्रा के जीवन यापन के लिए जरूरी सुविधाओं के लिए आज भी आधे शरणार्थी परिवार तरस रहे हैं।
जैसलमेर के ट्रांसपोर्ट नगर क्षेत्र में विगत करीब 35 वर्षों से आबाद शरणार्थी भील बस्ती में करीब 1500 से 2000 लोग निवास करते हैं। उनमें से जो आगे की ओर बसे हैं, वहां तक तो फिर भी कुछ नागरिक सुविधाएं पहुंची हैं, लेकिन पीछे वाले हिस्से में बसे परिवारों के लिए न तो बिजली है, न पीने का पानी और न ही गलियां-नालियां। इसके अलावा परिवारों में बढ़ोतरी से जमीन की कमी बेतहाशा महसूस की जा रही है। शादी के बाद आबादी विस्तार के चलते लोगों को यहां से निकल कर अन्यत्र बसना होता है और वहां वे जैसे-तैसे कहीं बसते हैं तो प्रशासन की तरफ से अतिक्रमण का हवाला देकर उनके आशियानों पर बुलडोजर चलाने जैसी कार्रवाइयां की जाती हैं।
पत्रिका टीम ने जैसलमेर की शरणार्थी भील बस्ती का दौरा किया तो कुछ लोग आपस में बतियाते नजर आए। वहां उपस्थित किशनराज भील ने बताया कि शरणार्थी परिवार मुख्यत: जैसलमेर, किसनघाट, अमरसागर व मूलसागर क्षेत्रों में रहते हैं। उनके पिता के पास वर्षों पहले 30 गुणा 45 का भूखंड था। वे चार भाई हैं। उनकी शादी के बाद संतानों के आगमन से परिवार बढ़ गए, अब रहने के लिए जगह चंद फीट ही मिल रही है। पढ़े-लिखे किशनराज ने बताया कि करीब 3000 शरणार्थी ऐसे हैं, जिन्हें लॉन्ग टर्म वीजा नहीं मिला। ऐसे हालात में उन लोगों के आधार कार्ड नहीं बन पा रहे हैं। इसके अभाव में बच्चों को स्कूलों में प्रवेश नहीं मिलता और अस्पतालों में जरूरी मुफ्त उपचार। तामलराम, खानूराम ने बताया कि बस्ती में अभी तक नल कनेक्शन नहीं हुए हैं, उन्हें सैकड़ों रुपए खर्च कर पानी खरीदना पड़ता है। आधी बस्ती में गलियों का फर्श तक नहीं बना। साफ-सफाई व्यवस्था के बुरे हाल हैं। सरकार व प्रशासन की ओर से कई परिवारों को उनके कब्जे वाले स्थान के पट्टे जारी नहीं किए जा रहे हैं, जिससे वे अतिक्रमणकारी होने का दर्द झेलते हैं।
सीमांत लोक संगठन के जिला पदाधिकारी दलीपसिंह सोढ़ा ने बताया कि जैसलमेर जिले में अब तक कुल 7000 से 8000 पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की जा चुकी है। उनका जीवन फिर भी पटरी पर है लेकिन आज भी करीब 4000 लोग ऐसे हैं, जिन्हें नागरिकता का इंतजार है। उनके लिए लॉन्ग टर्म वीजा समय पर नहीं मिलने की परेशानी पेश आ रही है। इसके बिना लोगों के आधार कार्ड नहीं बन पा रहे हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि पूर्व में जिला प्रशासन के स्तर से नागरिकता प्रमाण पत्र प्रदान किए जाने की प्रक्रिया बहुत धीमी और लम्बा समय लेने वाली थी, लेकिन सीएए कानून के प्रभाव में आने के बाद यह काम 3 से 6 महीनों में पूरा हो रहा है। गौरतलब है कि सीएए के तहत 31 दिसम्बर 2014 से पहले भारत आए विस्थापितों को वर्तमान में नागरिकता प्रदान की जा रही है।