सम्यक चातुर्मास की प्रवचनमाला में साध्वी प्रशमिता ने तप को जीवन का अनिवार्य अंग बताते हुए कहा कि तप से न केवल आत्मा बल्कि देह भी निखरती है।
सम्यक चातुर्मास की प्रवचनमाला में साध्वी प्रशमिता ने तप को जीवन का अनिवार्य अंग बताते हुए कहा कि तप से न केवल आत्मा बल्कि देह भी निखरती है। आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से तप का विशेष महत्व है। तप के माध्यम से सहजता से कर्मों की निर्जरा होती है। साध्वी प्रशमिता ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि परमात्मा महावीर ने भी अंतिम भव में कठोर तप एवं समता से कर्म क्षीण कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। प्रत्येक तीर्थंकर तप से ही तीर्थंकर नाम गौत्र का बंधन करते हैं। उन्होंने बताया कि एक नवकारसी तप भी नरक आयु को सैकड़ों वर्षों तक कम कर सकता है। पर्युषण महापर्व की ओर संकेत करते हुए साध्वी ने पूजन, स्वाध्याय, आराधना व अन्य धार्मिक क्रियाओं को तपपूर्वक करने का आह्वान किया। नयसार के भव से लेकर महावीर स्वामी के सिद्धत्व प्राप्त करने तक की तपयात्रा का भी उल्लेख किया।
अक्षत पूजा के आध्यात्मिक भाव को स्पष्ट करते हुए साध्वी ने कहा कि चावल ही ऐसा अनाज है जो अंकुरित नहीं होता, इसलिए पूजा के समय यह भावना होनी चाहिए कि हमारी आत्मा भी पुनर्जन्म से मुक्त हो मोक्ष प्राप्त करे।साध्वी अर्हमनिधि ने सुधर्मा स्वामी से शुरू हुई पट्ट परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि यह परंपरा 21 हजार वर्षों तक निरंतर चलेगी। साध्वी परमप्रिया और साध्वी अर्पणनिधि ने सभा को तप मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर अठ्ठाई तप संपन्न कर चुके तपस्वी युगल उत्तम ओमप्रकाश राखेचा और आकांक्षा उत्तम राखेचा का सकल संघ ने वरघोड़ा निकालकर सम्मान किया। संघ के सदस्यों ने साता पूछकर तप की अनुमोदना की। प्रवक्ता पवन कोठारी ने जानकारी दी।