मरुस्थल का जहाज कहलाने वाला ऊंट अब विकास की तेज रफ्तार में फंसकर काल के ग्रास में समा रहा है। पश्चिमी राजस्थान में हाईवे और रेलवे ट्रैक पार करते समय ऊंटों के हादसों में मारे जाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
मरुस्थल का जहाज कहलाने वाला ऊंट अब विकास की तेज रफ्तार में फंसकर काल के ग्रास में समा रहा है। पश्चिमी राजस्थान में हाईवे और रेलवे ट्रैक पार करते समय ऊंटों के हादसों में मारे जाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पारंपरिक चराई मार्ग सिमटने से ऊंट गांवों से निकलकर सड़कों और पटरियों तक पहुंच रहे हैं, जहां तेज रफ्तार वाहन और ट्रेनें इनके लिए घातक साबित हो रही हैं। गौरतलब है कि मार्च 2026 में श्रीभादरिया-लाठी रेलवे स्टेशन के पास हुए हादसे ने स्थिति की गंभीरता उजागर कर दी। यहां ट्रेन की चपेट में आने से छह ऊंटों की मौत हो गई। हादसे के बाद ट्रेन को ट्रैक पर रोकना पड़ा। जैसलमेर में सबसे अधिक ऊंट होने के बावजूद हादसों की घटनाएं भी यहां अधिक सामने आ रही हैं।
-लाखों रुपए का सीधा नुकसान
-ऊंट सफारी और पर्यटन से आय पर प्रभाव
-पारंपरिक पशुपालन पर संकट
मार्च 2026
अगस्त 2025
-जैसलमेर-रामगढ़ मार्ग पर तेज रफ्तार वाहन से टकराकर कई ऊंटों की मौत
नवंबर 2024
पोकरण क्षेत्र में हाईवे पर ट्रक से टकराकर 3 ऊंटों की मौत
राजस्थान में ऊंटों की स्थिति
राजस्थान में ऊंटों की संख्या में 71 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है। प्रदेश में देश के लगभग 85 प्रतिशत ऊंट मौजूद हैं, इसके बावजूद संरक्षण के प्रयास अपेक्षित स्तर पर नहीं हैं-
1992 में 7.46 लाख
2015 में 3.26 लाख
2019 में 2.13 लाख
2021 में अनुमानित 1.5 लाख लगभग
जिलेवार ऊंटों की संख्या (लगभग )
जैसलमेर: लगभग 65–70 हजार (प्रदेश में सर्वाधिक)
बाड़मेर: लगभग 40–45 हजार
बीकानेर: लगभग 35–40 हजार
जोधपुर: लगभग 15–18 हजार
नागौर: लगभग 10–12 हजार
अन्य जिले: कुल मिलाकर 15–20 हजार
हादसों को रोकने के लिए तत्काल उपाय जरूरी
-ऊंटों के गले में रिफ्लेक्टर बेल्ट अनिवार्य की जाए
-हाईवे और पटरियों के पास चेतावनी संकेत बोर्ड लगाए जाएं
-पारंपरिक मार्गों को चिन्हित कर पशु -कॉरिडोर विकसित किए जाएं
-संवेदनशील क्षेत्रों में गति सीमा निर्धारित की जाए
कॉरिडोर और बैरिकेडिंग जैसे प्रस्ताव सामने आए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनकी प्रगति धीमी है। पशुपालकों और ग्रामीणों का कहना है कि ठोस और त्वरित कार्रवाई के बिना हादसों पर रोक संभव नहीं है।
ऊंट संरक्षण संस्थान, धोलिया के अध्यक्ष बगडूराम विश्नोई के अनुसार चारागाह भूमि में कमी, खेतों की बाड़बंदी और सड़क-रेल नेटवर्क के विस्तार ने ऊंटों के पारंपरिक रास्तों को बाधित कर दिया है।
अब ऊंटों को दूर-दूर तक चराने ले जाना पड़ता है, जहां उन्हें हाईवे और रेल ट्रैक पार करने का जोखिम उठाना पड़ता है। रात के समय दृश्यता कम होने से हादसों की आशंका और बढ़ जाती है। मरुस्थल का जहाज अब विकास की रफ्तार के बीच संघर्ष कर रहा है। यदि चराई मार्ग, सुरक्षा उपाय और पशु कॉरिडोर विकसित नहीं किए गए तो ऊंटों की मौत का सिलसिला थमना मुश्किल है। यह केवल पशुधन का नुकसान ही नहीं, बल्कि राजस्थान की पहचान और पर्यटन के भविष्य पर भी गहरा खतरा साबित होगा।