पालीवाल ब्राह्मण समाज ने जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया है। मरुस्थल में तालाब निर्माण पर भी उन्होंने बहुत ध्यान दिया था। वर्षों पहले निर्मित तालाब आज भी जल संकट के समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पालीवाल ब्राह्मण समाज ने जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया है। मरुस्थल में तालाब निर्माण पर भी उन्होंने बहुत ध्यान दिया था। वर्षों पहले निर्मित तालाब आज भी जल संकट के समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गौरतलब है कि पालीवाल समाज का इतिहास 14वीं सदी में कुशल जल प्रबंधन और कृषि तकनीकों के लिए प्रसिद्ध था। पालीवाल समाज ने जैसलमेर के रेगिस्तानी क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए तालाबों का निर्माण किया, जो आज भी उनकी धरोहर के रूप में मौजूद हैं। पालीवाल समाज की ओर से निर्मित तालाबों की विशेषता यह थी कि वे वर्षा जल को संचित करने के लिए बनाए गए थे। इन तालाबों की संरचना इस प्रकार थी कि वे अधिकतम जल संचित कर सकें और लंबे समय तक उपयोग में आ सकें। तालाबों के किनारे पर पेड़-पौधे लगाए जाते थे, जो जल को शुद्ध रखने में मदद करते थे।
गौरतलब है कि पालीवाल समुदाय के लोग जैसलमेर जैसे मरुस्थली क्षेत्र में हजारों की संख्या में रहते थे और उनको खुद जीवनयापन के लिए, पशुओ के पीने की पानी की समस्या को दूर करने के लिए बरसाती पानी के संग्रहण की आवश्यकता थी। जिसको ध्यान में रखते हुए पालीवाल समुदाय के लोगों ने जैसलमेर व जोधपुर जिले आसपास जहां भी रहे, उन सैकड़ों गांवों के किनारे एक से अधिक तालाबों व नाडियों का निर्माण करवाया। ये जल स्रोत पालीवाल समाज ही नहीं बल्कि जन सामान्य के काम आते थे।
-तालाबों पर यात्री के ठहरने के लिए पठियाल का निर्माण करवाया जाता था व तालाब के किनारे ही भगवान हनुमान की प्रतिमा होती थी। कहीं-कहीं शिव-शक्ति मंदिर भी देखने को मिलते हैं।
-तालाब के किनारे ही पानी आवक की विपरीत दिशा में कुछ दूरी पर श्मसान होते थे, जहां से आकर इन तालाबों का उपयोग स्नान व तर्पण आदि के लिए काम लिया जाता था।
-तालाबों का निर्माण भी पालीवालों ने केवल पानी संग्रहण के लिए तो किया ही साथ ही जीवन में दिन प्रतिदिन की आवश्यकताओं का भी पूरा ख्याल रखा होगा।
पालीवाल समाज के तालाब आज भी जैसलमेर जिले में जल संकट के समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ये तालाब जैसलमेर जिले की एक महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इन तालाबों का संरक्षण और पुनर्निर्माण आवश्यक है ताकि आने वाली पीढिय़ां भी इनका लाभ उठा सकें और जल संकट से निपटने में सक्षम हो सकें।
इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल बताते हैं कि जिले के कुलधरा का उधनसर, कुलधरिया आदि, खाभा, जाजीया की जसेरी व बगतावरी तलाई, काठोड़ी, धनवा, खींया का मोतासर, बासनपीर, लवां की जानकी नाडी, भणियाणा गांव का भीम तालाब, पीथोड़ाई, नेडिय़ा, भू गांव जैसे सैकड़ों तालाब आज भी बरसाती जल संग्रहण को लेकर विख्यात है। ये जलस्रोत आज भी जन सामान्य की प्यास बुझा रहे हैं।