
नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. दक्षिण एशियाई वैज्ञानिकों और चमगादड़ संरक्षणकर्ताओं के एक समूह ने चमगादड़ और कोविड-19 के आपसी संबंध/मिथकों के बारे में संयुक्त रूप से व्यक्तव्य जारी कर किसान और प्रकृति के मित्र चमगादड़ों को नहीं मारने की अपील की है। इन दिनों सोशल मीडिया और टीवी पर अभूतपूर्व वैश्विक महामारी के लिए चमगादड़ को कोविड-19 के स्रोत के रूप में दर्शाया जा रहा है।
कुछ संदेशों में जनता से चमगादड़ों को अपने घरों के आस-पास से हटाने, उनके रहने के स्थानों पर पटाखे फोडऩे या नष्ट करने का अनुरोध के बाद चमगादड़ों को मारने की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई है। पश्चिमी राजस्थान के विभिन्न जिलों में एक दशक तक चमगादड़ों पर शोधकर्ता और वर्तमान में गुरु गोबिन्दसिंह इन्द्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी दिल्ली के सहायक आचार्य डॉ. सुमित डूकिया ने बताया कि चमगादड़ से इंसान को किसी भी तरह से कोई प्रत्यक्ष मानव स्वास्थ्य खतरा नहीं है।
सार्स जैसे वायरस के चमगादड़ से सीधे इंसानों तक पहुंचने की संभावना नहीं के बराबर है। साथ ही, चमगादड़ के उत्सर्जन (मल मूत्र) के माध्यम से कोरोनावायरस या किसी अन्य भी वायरस का मनुष्यों को सीधा प्रभावित करने का भी कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। चमगादड़ हमारे पारिस्थितिक तंत्र में महत्वपूर्ण सेवाएं देते हैं। वर्तमान में समाज को एक स्वस्थ और पारिस्थितिकीय सह-अस्तित्व के लिए चमगादड़ के बारे में महामारी विज्ञान के तथ्यों के साथ-साथ इनके जीवन के कई पहलुओं पर और अधिक जागरूकता की आवश्यकता है।
जोधपुर में चमगादड़ों की 11 प्रजातियां
जोधपुर शहर में मेहरानगढ़, रेलवे स्टेशन, सूरसागर महल, भीम भड़क, रेल प्रबंधक कार्यालय, बालसमंद व बड़ली, मंडोर उद्यान विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में वीरान पड़ी हवेलियों और घरों में टेरोपस जाइजेन्टियस याने फलखोर चमगादड़ों सहित कुल 11 प्रजातियां है। पश्चिमी राजस्थान के जिलों में 15 चमगादड़ों की प्रजातियां है।