
जोधपुर।
जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पारम्परिक रूप से खाए जाने वाले मोटे अनाजों पर शोध किया, जिनमें वर्तमान में प्रचुरता में खाए जाने वाले गेहूं-धान-चावल से अधिक पौष्टिकता पाई गई। विश्वविद्यालय में रागी (मडुंआ), कांगनी, चीना, कोडूमिलेट, लघु धान आदि मोटे अनाजों की विभिन्न किस्मों पर शोध किया गया । गौरतलब है कि विश्व की बढ़ती हुई जनसंख्या को पौष्टिक खाद्यान्न की उपलब्धता कृषि वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती बनी हुई है। देश व प्रदेश के कृषि वैज्ञानिक इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए उच्च पौष्टिकता वाली विभिन्न खाद्य फसलों पर शोध में लगे हुए है।
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जलवायु के अनुरूप
गेहूं-धान की तुलना में मोटे अनाजों में पानी की खपत बहुत कम व दूसरे रसायनों की कम जरुरत पड़ी, ये पर्यावरण के लिए बेहतर तथा जलवायु परिवर्तन को सहन करने में सक्षम पाए गए। ये अनाज जल्दी खराब नहीं होते है व लंबि अवधि तक खाने लायक रह सकते है।
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आजादी के बाद गेहूं-चावल को अपनाया
वर्ष 1950 के दशक तक देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन में मोटे अनाज की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी थी। मोटे अनाज के तौर पर ज्वार, बाजरा, रागी, जौ, लघु्र धान या कुटकी, कांगनी, चीना आदि मोटे अनाजों का उपयोग होता था। 1960 के दशक में आई हरित क्रांति के दौरान गेहूं-चावल मुख्य खाद्यान्न बन गया। लोगों ने सदियों से खाते आ रहे मोटे अनाज से मुंह मोड़ लिया और उनसे दूर होते चले गए।
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मोटे अनाज में पौष्टिकता की भरमार
रागी (मडुंआ)
- उच्च पोषण वाला मोटा अनाज आयरन 3.9 मिग्रा प्रति 100 ग्राम होता है।
- कैल्सियम 344 मिग्रा प्रति 100 होता है।
कांगनी
- आयरन के साथ फाइबरयुक्त व प्रोटीन का स्त्रोत।
- मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद, इम्यूनिटी बढ़ाता है।
चीना
- ब्लडशुगर लेवल को नियंत्रित करती है।
- आयरन-फाइबर का स्त्रोत होने के कारण कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है
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विश्वविद्यालय के अनुभवी व युवा वैज्ञानिकों की टीम मोटे अनाजों पर शोध में लगी हुई है। जिनमें अब तकअच्छे परिणाम आए है। इनकी रिपोर्ट केन्द्र को भेजी गई है।
प्रो डॉ बीआर चौधरी, कुलपति
कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर