
- जितेन्द्र सिंह शेखावत
जयपुर। जनवरी 1927 का महीना जयपुर के लिए बिजली से रोशनी की नई सौगात लेकर आया था। इससे पहले शहर के कच्चे-पक्के घर चिमनी, लालटेन और लैम्प पोस्ट से रोशनी होते। एक जनवरी 1927 को शाम पांच बजे सवाई मानसिंह ने राम मंदिर पावर हाउस पर अपने सामने रखे बक्से के बटन को दबाया तब उसमें से फूल बरसे और पूरी इमारत रोशन हो गई। रंगीन रोशनी का फव्वारा चला और बल्बों से सजाया पेड़ दमक उठा। लोकार्पण समारोह में अंग्रेज हाकीमों के अलावा खेतड़ी राजा सहित करीब पांच सौ गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। सार्वजनिक निर्माण मंत्री खान बहादुर ने कुछ पढ़ा जो सुनाई नहीं दिया। उस दिन चांदपोल व अजमेरी दरवाजा ,यादगार, म्यूजियम, कोतवाली, ईसरलाट, त्रिपोलिया और मोतीडूंगरी भी रोशनी में नहा गए।
6 जनवरी को स्वीडन के राज कुमार व राजकुमारी आए थे, तब उनके सम्मान में अलबर्ट हॉल पर रोशनी की गई। सन् 1924 में रेजीडेंट सर आर. आर. ग्लांसी की अध्यक्षता में हुई स्टेट कौंसिल की बैठक में बिजली परियोजना का निर्णय कर भारत सरकार के इंडियन स्टोर्स विभाग से समझौता किया। पावर हाउस इमारत निर्माण के अलावा तीन जनरेटर, तार आदि उपकरण सन् 1925 में मैसर्स विकर्स पैटर्स कम्पनी से मंगाए। पावर हाऊस के लिए भूमि अधिग्रहण के साथ विदेशी मशीनरी को पावर हाउस तक लाने के लिए रेलवे स्टेशन से रेल लाइन बिछाई गई।
अंग्रेज अभियंता फॉयसेट को 1250 रुपए और सहायक अभियंता पद्मनाभन को 350 रुपए महीना वेतन पर रखा गया। पावर हाउस आदि के निर्माण पर कुल 11 लाख 3 हजार 239 रुपए का खर्चा हुआ। सियाशरण लश्करी के मुताबिक शहर की सुंदरता बरकरार रखने के लिहाज से खंभों के अलावा कुछ स्थानों पर भूमिगत लाइनें बिछाई गई। बिजली बचत के लिए पूरण मासी की रात में एवं रेल नहीं आने के समय बिजली बंद रखी जाती। वैसे जयपुर में 6 मार्च 1887 को गैस की बिजली आई तब सवाई राम सिंह ने विलायत से आए गैस बिजली प्लांट का उद्घाटन किया। उस समय राजपूताना की किसी भी रियासत में बिजली नही थी। जर्मन इंजीनियरों ने चौड़ा रास्ता परकोटे पास में गैस बिजली प्लांट स्थापित किया। अंग्रेज एसजे टेलरी मुख्य अभियंता थे।