
जोधपुर।
भारत में टमाटर का अच्छा उत्पादन होने के बावजूद भी प्रतिवर्ष ३ हजार करोड़ रुपए की टोमेटो प्यूरी (टमाटर का भर्ता) विदेशों से आयात करनी पड़ रही है। इसकी वजह देश में प्रसंस्करण योग्य टमाटर की नई किस्में विकसित नहीं होना है। बम्पर उत्पादन को देखते हुए देश के कृषि व सब्जी वैज्ञानिकों के सामने प्रसंस्करण योग्य टमाटर की किस्मों को विकसित करना चुनौती है। इसके लिए देश के प्रमुख तीन केन्द्रों में प्रसंस्करण योग्य टमाटर की किस्मों को विकसित किया जाएगा, जिसके लिए जल्द ही अनुसंधान शुरू होगा और देश को नई किस्में मिलेगी। देश में प्रतिवर्ष 12 मिलीयन टन टमाटर का उत्पादन होता है।
भारतीय टमाटर सुर्ख लाल नहीं, लाइकोपेन की कमी
भारत में उत्पादित होने वाले टमाटर सुर्ख लाल रंग के नहीं होत है। इनमें लाल रंग के मुख्य कारक लाइकोपेन की कमी होती है। भारतीय टमाटर में करीब 3.5 से 4 मिलीग्राम लाइकोपेन होता है जबकि विदेशी टमाटर में करीब 6 से 7 मिलीग्राम होता है। इस वजह से सुर्ख लाल टमाटर की मांग ज्यादा होते है। यहां होगा रिसर्च इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली (इसको पूसा इंस्टीट्यूट के नाम से भी जाना जाता है ), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ होर्टीकल्चर बैंग्लुरू व पंजाब एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी में प्रोसेसिंग टाइप नई वैरायटियों पर रिसर्च किया जाएगा।
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अलग जोन विकसित करने होंगे
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ एके सिंह ने बताया कि टमाटर की किस्में विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों को अलग जोन विकसित करने होंगे। निर्यात के लिए प्रसंस्करण योग्य व घरेलू उपयोग के लिए अलग वैरायटी विकसित करनी होगी।
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भारतीय टमाटर 'टेबल टोमेटो , भण्डारण क्षमता नहीं
भारतीय टमाटर की भण्डारण क्षमता कम होती है। जिनका जल्द व सीधा उपयोग किया जाता है, इसलिए भारतीय टमाटर को 'टेबल टोमेटो कहा जाता है। ये जल्दी खराब हो जाते है। जबकि विदेशी टमाटर की भण्डारण क्षमता अच्छी होती है, इसलिए उनकी प्रोसेसिंग की जा सकती है व कई उत्पादों में काम लिया जा सकता है।
डॉ बीएस तोमर, विभागाध्यक्ष
सब्जी विज्ञान विभाग पूषा केन्द्र, नई दिल्ली