
जोधपुर( jodhpur news current news ) .नाटक लेखन में संस्कार महत्वपूर्ण हैं। संस्कारविहीन उपलब्धि बेमोल होती है और संस्कारहीन रिश्ते रिश्ते नहीं होते ( cultural news in hindi )। सुपरिचित रंगकर्मी ( Actor ) , नाटककार ( playwright ) और निर्देशक ( director ) लक्ष्मीनारायण भटनागर ने पत्रिका प्लस से एक भेंट में यह कहा ( latest NRI news in hindi ) । उन्होंने कहा कि एेसे रिश्तों में या तो छल अथवा स्वार्थ होता है। चाहे रक्त संबंधी हों या दोस्ती। संस्कारहीन रिश्ते मायने नहीं रखते। मैंने अपनी नाट्यकृति 'रिश्तों के आवरण' में समाज की यही सच्चाई उजागर की है।भटनागर ने कहा कि समाज, पाश्चात्य संस्कृति, फिल्में, टीवी और मोबाइल की अधिकता संस्कारों पर चोट करती है। किसी के यहां जाने पर कोई आपके बजाय मोबाइल को महत्व देता है और कोई आपके यहां आता है तो आप उसके बजाय मोबाइल पर लगे रहते हैं। इस तरह मोबाइल हमें संस्कारों से दूर करता है। उन्होंने कहा कि नाटक को मंचन से जीवन मिलता है। कलाकार और निर्देशक लेखन की उन भावनाओं को प्रभावी मंचन से अभिव्यक्त करते हैं, जिसकी दशकों तक सीधी पहुंच उस रचना को सार्थकता प्रदान करती है।
एल एन भटनागर : एक नजर
जोधपुर में बैंक मैनेजर पद से रिटायर हुए जालोर मूल के एल एन भटनागर सन 1978 से रंगकर्म से जुड़े हुए हैं। उन्हें नाटक लेखन और कई निर्देशकों के साथ रंगकर्म तो किया है, नाटक का निर्देशन भी किया है। भटनागर ने सन 1992 में जालोर के किले पर आधारित नाटक 'स्वर्ण गिरि या सिंदूर' और सन 1995 में चार ध्वनि नाटक लिखा था। उनके लिखे 'दहशत के पल' नाटक का स्व.दलपत परिहार के निर्देशन किया था। उन्होंने सुनील माथुर निर्देशित नाटक 'कालचक्र' में छोटे भाई तथा एक और द्रोणाचार्य में एकलव्य की भूमिका निभाई है। जबकि जितेंद्र जालोरी निर्देशित 'चलते फिरते बुत' नाटक में बुत का किरदार निभाया। जबकि दिनेश अरोड़ा निर्देशित 'आदमी का गोश्त' नाटक में ग्रामीण और 'पोस्टर' नाटक में मजदूर के रूप में अदाकारी की। वहीं भटनागर लिखित और निर्देशित धारावाहिक 'खुशबू का सफर' का जयपुर दूरदर्शन पर प्रसारण हुआ था।