
ओम टेलर. जोधपुर
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर हम आपको शहर में 18वीं शताब्दी में बने प्राचीन महामंदिर के इतिहास से रूबरू कराना चाहते है। यह मंदिर भी कभी योगियों का गढ़ रहा था। मंदिर की दीवारों पर आज भी नाथ सम्प्रदाय के कई योगियों द्वारा योग, हठयोग व ध्यान करने की मुद्राएं उकेरी हुई साफ नजर आती है। प्राचीन समय में संत-महात्मा खुद को स्वस्थ रखने के लिए योग, ध्यान करते थे तथा चाहते थे कि आने वाली पीढ़ी भी इन्हेंं अपने जीवन में अपनाएं। जिससे उनका भी तन-मन स्वस्थ रह सके। लेकिन हैरत की बात यह है कि यह प्राचीन मंदिर इन दिनों अपना वैभवशाली अस्तित्व खो रहा है। नाथ सम्प्रदाय की निजी सम्पत्ति होने का हवाला देते हुए सरकार भी इस शहर की इस नायाब धरोहर को संजोए रखने की ओर ध्यान नहीं दे रही। नतीजन इस मंदिर की रंग-रोगन खराब हो चुका है। कई जगह दीवारों में दरारें आ चुकी है तथा गुमद क्षतिग्रस्त हो गए। जिन्हें दुरुस्त नहीं करवाया गया तो आने वाले वर्षों में अन्य कई एतिहासिक इमारतों की तरह यह वैभवशाली मंदिर भी खंडहर बन जाएगा।
मंदिर की दीवारों पर योग, हठ योग की 84 कलाएं
100 खंभो पर टिक इस वैभवशाली मंदिर के गर्भगृह में 84 योगासनों और इतिहास के प्रसिद्ध नाथ योगियों के चित्र उकेरे हुए है। चित्रों में प्राकृतिक रंगों और स्वर्ण नक्काशी का उपयोग किया गया था। लेकिन सार-संभाल के अभाव में इनमें से कई चित्र धुलमित हो चुके है। मंदिर के शिखर पर लगे कई कलश टूट चुके है। छतरियां भी क्षतिग्रस्त हो चुकी है। मंदिर की दीवारों पर नाथ योगियों से मिलने वाले वाले राजाओं के चित्र भी मंदिर की दीवारों पर नाम सहित उकेरे हुए आज भी नजर आते है।
इसलिए कहते हैं इसे महामंदिर
जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने अपने इष्ट जलंधरनाथ के शिष्य आयस देवनाथ के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसका निर्माण कार्य 9 अप्रेल 1804 को शुरू हुआ और चार फरवरी 1805 में मंदिर बनकर तैयार हो गया। महाराजा मानसिंह के समय इस मंदिर को ठिकाने का दर्जा प्राप्त था। राजस्व का एक चौथाई हिस्सा महामंदिर में जमा होता था। नाथ सम्प्रदाय के लिए विशेष न्यायप्रणाली भी थी। कहा जाता है कि मंदिर में आने वाले हर व्यक्ति के प्राण की रक्षा करना नाथ अपना धार्मिक कर्तव्य समझते थे। कहां जाता था कि तत्कालीन समय में इससे बड़ा कोई मंदिर जोधपुर में नहीं था इसलिए इसे महामंदिर कहा जाने लगा।
प्राचीन इमारत है सरकार इसके संरक्षण को लेकर प्रयास करें
आयस देवनाथ की नौंवी पीढ़ी के राजेश नाथ ने बताया कि राजा मानसिंह ने हमारे पूर्वज देवनाथ को यह मंदिर बनाकर दिया था। वे मानते थे कि उनके आशीर्वाद से उनको राज मिला है। वर्तमान में स्कूल 1968 से चल रही है। जिसका किराया महज 150 रुपए दिए जा रहे है। यह प्राचीन इमारत है। सरकार या संस्था इससे संरक्षण को लेकर उचित कदम उठाए। जिससे इस ्रप्राचीन इमारत को खंडहर होने से बचाया जा सके। हमनें तो कई बार इसकी मरम्मत करवाई लेकिन पूरे मंदिर का जीर्णोद्वार करवाना हमारे लिए भी संभव नहीं।