
नंदकिशोर सारस्वत
जोधपुर. पश्चिमी राजस्थान की मरुधरा में तेजी से लुप्त हो रहे प्रमुख वन्यजीव पैंथर(तेंदुआ) और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड गोडावण के लिए बने करोड़ों के पायलेट प्रोजेक्ट के बावजूद दोनों ही वन्यजीवों की संख्या एक दशक से दो अंकों से आगे नहीं बढ़ पा रही है। सात साल पहले घोषणा के बाद पिछले साल कुंभलगढ़ और रावली टॉडगढ़ में शुरू हुए पैंथर प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने ढाई करोड़ की राशि जारी भी की लेकिन वैश्विक महामारी कोरोना के कारण बजट रिलीज नही हो पाया है। परियोजना का मुख्य कार्य पैंथर संरक्षण और जनमानस में जागरूकता लाकर इको टूरिज्म को बढ़ावा देना था। जोधपुर संभाग के पाली जिले के बेड़ा और आसपास के क्षेत्र में पैंथर मानवीय आबादी के आसपास विचरण करते है। यही कारण है कि वनविभाग ने पाली जिले के जवाई क्षेत्र को भी पैंथर संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है। विभाग की सैन्सस के अनुसार जोधपुर संभाग के पाली, जालोर, सिरोही जिलों में पैंथर की संख्या 37 ही बची है।
आहार और पानी की मुख्य समस्या
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ हेमसिंह गहलोत के अनुसार कुंभलगढ़ सेंचुरी, राजसमंद, पाली की अरावली पहाडिय़ां पैंथर के प्राकृत आवास है। इन क्षेत्रों में पैंथर के प्राकृतिक भोजन कहे जाने वाले वन्यजीव खत्म हो चुके है। परम्परागत आवास में मानवीय हस्तक्षेप बढऩे, अवैध खनन, अतिक्रमण बढऩे से वैकल्पिक भोजन की तलाश में भटकते हुए पैंथर कई बार जोधपुर,बाड़मेर,नागौर जिले तक पहुंच चुके है। जोधपुर के वन्यजीव चिकित्सक डॉ. श्रवणसिंह राठौड़ जोधपुर सहित पूरे संभाग में 34 पैंथर रेस्क्यू कर चुके है। इनमें तीन पैंथर वर्तमान में जोधपुर के माचिया जैविक उद्यान में सुरक्षित है। पैंथर के प्रमुख आश्रय स्थलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और आहार पानी की कमी के कारण ही पैंथर दूसरी जगहों तक पहुंच रहा है। जोधपुर संभाग के बाली उपखंड क्षेत्र में ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए अवैध रूप से पैंथर को ट्रेन्क्यूलाइज कर माइक्रोचिप लगाने की शिकायतें भी मिलती रही है।
अरावली में कब कितने पैंथर
2011-37
2012-36
2013-37
2014-25
2015-29
2016-28
2017-29
2018-45
2019-37
अब तक सिर्फ झालाना प्रोजेक्ट पर ध्यान
वनविभाग ने प्रोजेक्ट टाइगर की तर्ज पर कुल 21 करोड़ के पैंथर पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर राजस्थान के तीन अभयारण्यों का चयन किया था। अभी तक झालाना प्रोजेक्ट में ही लैपर्ड योजना पर काम हुआ है। झालाना में प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद पिछले साल कुम्भलगढ़ अभयारण्य और रावली टाडगढ़ के लिए 2.5 करोड़ रिलीज हुए लेकिन कोरोना की वजह से बजट फ्रीज हो गया।
यादवेन्द्रसिंह, सहायक वन संरक्षक, कुंभलगढ़ सेंचुरी