
जोधपुर. जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय की प्री पीएचडी (एमपीईटी)परीक्षा में वार्षिक पद्धति से स्नातकोत्तर करने वाले कई विद्यार्थियों के पिछडऩे का खतरा बना हुआ है। विवि पीएचडी में प्रवेश के लिए एमपीईटी का 50 प्रतिशत और पीजी के 50 प्रतिशत अंक जोड़ेगा। विवि ने वर्तमान में स्नातकोत्तर में वार्षिक की जगह सेमेस्टर प्रणाली लागू कर रखी है। सेमेस्टर प्रणाली में विद्यार्थियों को अंक अधिक मिलते हैं जिसके कारण वार्षिक पद्धति में पीजी करने वाले छात्र पीछे रह जाएंगे।
जेएनवीयू की वार्षिक पद्धति परीक्षा प्रणाली में 65 से 70 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले टॉपर होते थे, जबकि सेमेस्टर प्रणाली में 85 से 90 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले टॉपर बन रहे हैं। ऐसे में वार्षिक परीक्षा पद्धति के विद्यार्थियों को सीधा-सीधा 15 से 20 अंक का नुकसान हो रहा है। पत्रकारिता में 2016 गोल्ड मेडल के करीब 61 प्रतिशत व वहीं 2017 में वार्षिक पद्धति से गोल्ड मैडल हासिल करने वाले छात्र के 66.78 प्रतिशत बने। जबकि 2020 में टॉपर के करीब 76 प्रतिशत बने हैं। इसके बाद अब पहली बार पत्रकारिता में पीएचडी की सीटें आई है। दोनों टॉपर है और दोनों के मध्य 12 अंक का अंतर है, जबकि पीएचडी प्रवेश परीक्षा में एक अंक का भी अंतर रहता है तो वे पीएचडी करने से चूक जाएंगे।
सेमेस्टर व वार्षिक पद्धति का औसत प्रतिशत निकालें
छात्र नेता पूर्व अकादमिक सदस्य भूपेंद्र सिंह साकड़ा और महाराणा प्रताप शोध पीठ संघर्ष समिति के अध्यक्ष रघुवीर सिंह बेलवा ने गुरुवार को कुलपति को ज्ञापन देकर सेमेस्टर स्नातकोत्तर और वार्षिक स्नातकोत्तर के बीच औसत प्रतिशत निकालकर पीएचडी प्रवेश परीक्षा की मेरिट बनाने की मांग की है।
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‘परीक्षा विवि के प्रावधान के अनुसार ही हो रही है। सेमेस्टर व वार्षिक पद्धति में अधिक अंतर नहीं रहता है।’
प्रो ज्ञानसिंह शेखावत, समन्यक, प्री पीएचडी परीक्षा जेएनवीयू