जोधपुर

फ्लैश बैक: गिलहरी के बाल की कलम, दो दिन में बनता था एक बैनर

चुनाव प्रचार की तकनीक बहुत बदल चुकी है। चुनाव में पहले हाथ से पेन्ट किए और लिखे बैनर व पोस्टर लगते थे, और इस काम में महीनों पहले कई कई लोग लगते थे।
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Oct 25, 2018
elelction 2018

जोधपुर। चुनाव प्रचार की तकनीक बहुत बदल चुकी है। चुनाव में पहले हाथ से पेन्ट किए और लिखे बैनर व पोस्टर लगते थे, और इस काम में महीनों पहले कई कई लोग लगते थे। आज सब कुछ एक बटन-एक क्लिक पर आ चुका है।

पहले चार आदमी दो दिन में एक बैनर बनाते थे और अब मशीन से पांच मिनट में तैयार हो जाता है। आनंद सिनेमा के पास बैनर पोस्टर का काम करने वाले पेन्टर बाबू भाई बताते हैं कि अब यह सब बीते जमाने की बात हो गई। उन दिनों हम पेन्टर्स लकड़ी के फ्रेम बनवा कर लगाते थे और फिर उस पर वाटर कलर से पेन्ट करते थे। चार आदमियों को फोटो पर चुनावी संदेश लिखने में पूरा दिन लगता था।

चुनावों के दौरान पेंटरों को रोजगार मिलता था। उनकी अच्छी आमदनी हो जाती थी। उस काम में आमदनी और रोमांच दोनों से खुशी मिलती थी कि लोकतंत्र के उत्सव में हम भी योगदान दे रहे हैं। पेंटर जिगर हुसैन ने बताया कि चुनावों के दौरान ये बैनर पोस्टर सन 2004 तक तो लिखे जाते थे, लेकिन बाद में इनका चलन खत्म हो गया। बैनर हाथ से बनाते थे। ये कपड़े के बैनर होते थे और उस पर गिलहरी के बाल की कलम से कपड़े पर लिखते थे।

अब कारीगर हुए गौण
पेन्टर बाबू भाई ने बताया कि हर शहर में हर पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवार तक इन बैनर्स और पोस्टर्स के निर्माण पर नजर रखते थे। वक्त बदला तो रेडिमेड कैम्पेन के कारण ये सब काम एजेंसियों को दिए जाने लगे और ऐसे कामों के लिए कारीगर गौण हो गया। अब तो पार्टियां और उम्मीदवार ये बनाने के लिए एजेंसी को काम दे कर बेफिक्र हो जाते हैं। इस वजह से पेन्टरों को होने वाली आमदनी बंद हो गई।

रात भर भरते पेंट
सरदारजी की सोजती गेट वाली दुकान से फोटो ब्लॉक बनता था। स्टेंसिल लेकर रात भर दीवारों पर उसका पेंट भरते। तब पता चलता इन साहब को टिकट मिला है।

Updated on:
10 Nov 2018 05:13 pm
Published on:
25 Oct 2018 07:20 am