
जोधपुर. मानसून की बेरुखी से मारवाड़ में अकाल की आशंका खड़ी हो गई है। फसलों पर संकट के साथ चारे-पानी की संभावित कमी को देखते हुए ग्रामीणों एवं पशुपालकों में मायूसी का माहौल है। पूरा सावन सूखा बीतने के बाद भी पश्चिम राजस्थान में बारिश को लेकर मौसम विभाग के पूर्वानुमान उत्साहजनक नजर नहीं आ रहे। समूचे इलाके में पर्याप्त बारिश नहीं होने से बांध और जलस्रोत रीते पड़े हैं। गांवों में तालाब और नाडियों के पैंदे दिखने लगे हैं। संभाग के सबसे बड़े जवाई बांध में महीने भर का पानी भी नहीं बचा है। इस हालत में किसानों और ग्रामीणों की ये चिंता लाजिमी है कि अभी भी ढंग की बारिश नहीं हुई तो आदमी तो जैसे तैसे व्यवस्था कर लेगा, लेकिन पशुओं का क्या होगा। इनके पीने के लिए न पानी होगा और न ही खाने के लिए चारा।
मायूसी एवं निराशा का यह माहौल मौसम विभाग के कम बारिश के संकेत देने के बाद से ही है। अब तो हर आदमी यही दुआ कर रहा है कि कुछ ठीक ठाक बारिश हो जाए तो फसलें भले ही पूरी न हो, लेकिन पेयजल और पशुओं के लिए चारे-पानी का जुगाड़ तो हो जाए। आंकड़े भी लोगों की चिंता को सही साबित कर रहे हैं। पश्चिम राजस्थान में अगस्त तक 216.1 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार एक जून से अब तक मात्र 167.7 मिमी पानी बरसा है, जो सामान्य से लगभग 22 प्रतिशत कम है। जोधपुर में अब तक सिर्फ 92.5 मिमी बरसात हुई है। सिरोही में 66, जालोर में 60, बाड़मेर में 54 तथा जोधपुर-पाली में सामान्य से 38-38 फीसदी बरसात कम हुई है। ये आंकड़े अभी से भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं।
इंद्रदेव की नाराजगी से आम आदमी में चिंता नजर आ रही है, लेकिन सरकारी मशीनरी अब भी इंतजार ही कर रही है। दूसरी तरफ कृषि विशेषज्ञ मान रहे हैं कि कम बारिश होने से मारवाड़ में अकाल की स्थिति है। अब यदि बारिश हो भी जाती है तो किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पाएगा। इस बार वैसे भी फसलों की बुवाई का लक्ष्य कहीं भी पूरा नहीं हुआ है और जहां अच्छी बारिश की उम्मीद में किसानों ने फसलों की बुवाई कर दी थी, उनमें से लगभग 60-70 प्रतिशत फसलें लगभग नष्ट हो चुकी हैं। हालात आसन्न अकाल की गवाही दे रहे हैं। यानी राम तो रूठ ही गया है। अब बारी राज की है। उसको चारे-पानी की समस्या के समाधान के लिए अभी से तैयारी शुरू करनी होगी। फसल खराबे के आकलन के लिए गिरदावरी समयबद्ध तरीके से पूरी करने की कार्ययोजना बनानी होगी। साथ ही पेयजल संकट से निपटने के लिए भी अभी से कंटीजेंसी प्लान बनाकर मंजूर करने की तैयारी शुरू करनी होगी। वरना आग लगने पर कुआं खोदने की प्रवृत्ति समस्या बढ़ाएगी ही।