
जोधपुर. रसायनिक खाद की मारामारी और दिनों दिन बढ़ती कृषि लागत के बीच जीरो बजट प्राकृतिक खेती काश्तकारों को मालामाल कर सकती है। केवल एक गाय के गोबर व गौ-मूत्र से 30 एकड़ खेती में कीटनाशक व खाद की पूर्ति संभव है। अफसोस कि प्रदेश में यह खानापूर्ति की खेती बनकर रह गई है।
घोषणा के मुताबिक राज्य सरकार ने पहले पूरा बजट नहीं दिया। जो मिला, उसे ज्यादातर ने कागजी प्रशिक्षणों में ठिकाने लगाया। पायलट प्रोजेक्ट में शामिल सिरोही व बांसवाड़ा जिले के कुछ चयनित गांवों की पड़ताल में अधिकारी से लेकर पर्यवेक्षक पूरी जानकारी तक नहीं दे पाए। चयनित गांव के किसानों ने भी इससे अनभिज्ञता जाहिर की।
यह है जीरो बजट खेती
यह देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। इनसे जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदना नहीं पड़ता। पानी व बिजली भी मौजूदा की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है। गुणवत्तापूर्ण उपज होती है और उत्पादन लागत लगभग शून्य।
इनसे सीखें
आंध्रप्रदेश सरकार ने घोषणा की है कि वर्ष 2024 तक प्रदेश में इसे पूरा लागू कर 60 लाख किसानों को जोड़ेगे। दो वर्ष में करीब छह लाख किसानों को जोड़ दिया। आठ राज्यों में इससे करीब चार लाख हैक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया है। राजस्थान का प्रतिशत शून्य है। राज्य में प्रशिक्षण के लिए योग्य व्यक्ति ही नहीं मिले। ऐसे में10 करोड़ की घोषणा के बावजूद दो करोड़ का बजट प्रावधान रखा।
राज्य की स्थिति
- वर्ष 2019-20 के बजट में घोषणा।
- पायलट प्रोजेक्ट में बांसवाड़ा, सिरोही व टोंक की 168 ग्राम पंचायतों में एक करोड़ 24 लाख 51 हजार खर्च।
- अब 15 जिले और चयनित।
सीधी बात
(संजय तनेजा, कृषि उपनिदेशक सिरोही)
सवाल- जीरो बजट खेती की प्रोग्रेस क्या है?
तनेजा- वर्ष 2019-20 में 5 हजार किसानों को प्रशिक्षण दिया, अगले साल 300 और प्रशिक्षित।
सवाल- कोरोना काल में प्रशिक्षण कैसे संभव हुआ?
तनेजा- पहला प्रशिक्षण कोरोना से पहले दिया। बाद की तिथि मैं देखकर बता सकता हूं।
सवाल-दो साल बाद परिणाम क्या रहा?
तनेजा- आपने पूछा है तो मैं ट्रेस आउट करवाता हूं।
इन्हें भी देखिए
(जागृति, चयनित ग्राम मोटाटाण्डा की कृषि पर्यवेक्षक)
सवाल- जीरो बजट खेती के बारे में क्या आप जानती हैं। कितने को लाभान्वित किया।
जवाब- यह खेतों के संबंध में है। कल शिविर है, वहां पूरी डिटेल बता देंगे। हम तो नए लगे हैं। अभी केवल लिस्ट मांगी है।
काश...हमें बताते
मोटाटाण्डा में इस तरह की जानकारी नहीं दी गई। रबी की बुवाई के लिए खाद की कमी महसूस हो रही है। इस बारे में बताते तो एक छोटी पहल कर सकते थे। देसी गाय सहित काफी पशुधन है।
बरमा नायक, किसान