
जयकुमार भाटी/जोधपुर. एक अलग ही पहचान बनाने की आदत है मेरी, तकलीफों में भी मुस्कुराने की आदत है मेरी। यह कहना हैं शहर की फैशन डिजाइनर शालिनी राजेन्द्र शर्मा का। जिन्होंने शादी के बाद भी अपने नाम के आगे पिता का नाम लगा रखा हैं। शालिनी ने बताया कि परम्परागत रंगाई, छपाई, जरदोजी, बंधेज, विभिन्न प्रांतों की पारम्परिक कशीदाकारी व खादी को बढ़ावा देना मेरा उद्देश्य हैं। ऐसे में मैं जरूरतमंद परिवार व युवा पीढ़ी को अपने पारम्परिक काम से जोड़े रखने का प्रयास कर रही हूं। महिलाओं को राजस्थानी पोशाक की सिलाई के साथ वर्तमान फैशन के अनुरूप पोशाक तैयार करना सीखा कर आत्मनिर्भर बनाने का काम भी कर रही हूं, जिससे उन्हें रोजगार मिल सकें और उनका पारम्परिक काम चलता रहें।
पिता के नाम से गर्व की अनुभूति
शालिनी का जन्म जोधपुर के परकोटा क्षेत्र ब्रह्मपुरी में रहने वाले पिता राजेन्द्र शर्मा और माता गोपी शर्मा के घर 22 जनवरी 1989 को पहली संतान के रूप में हुआ। वन विभाग में कार्यरत उनके पिता ने शालिनी का लालन-पोषण बेटे की तरह किया, जिसकी वजह से उन्होंने भी अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम लगाना शुरू कर दिया। शालिनी ने कहा कि नाम के साथ पिता का नाम अपने आप में मुझको एक समृद्ध और सार्थक सहयोग देने की अनुभूति करवाता है। शादी के बाद भी पिता का नाम लगाने पर मेरे समक्ष कई सवाल खड़े हुए लेकिन मुझे बताने में खुशी होने के साथ गर्व की अनुभूति भी होती हैं।
शादी के बाद डिजाइनर बनने का मिला अवसर
शालिनी के अनुसार सरकारी नौकरी वाला लडक़ा मिलने पर सीनियर पास करते ही विजय शर्मा के साथ मेरी शादी हो गई। उस समय विजय ने वादा किया था कि शादी के बाद भी मैं पढ़ाई जारी रख सकती हूं। उन्होंने अपने वादे के अनुसार मेरी पढ़ाई पूरी करवाने के साथ मेरे सपने को पूरा करने में सपोर्ट किया। यही से मैंने फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में कदम रखा। मेरे लिए यह सफर इतना आसान नहीं था, लेकिन मेरी सास की ओर से हर कदम पर मिली मदद से मैंने हर चुनौतियों का सामना करते हुए अपने सपने को साकार किया। मेरे लिए फैशन डिजाइनिंग के तीन साल चुनौतियों से भरे हुए थे। पहले साल सास का बीमार हो जाना और फिर दूसरे साल गर्भपात होने के दूसरे दिन ट्रेनिंग पर जाना। आखरी साल में एक ओर छोटे भाई को खो देना तो दूसरी तरफ फिर से खुद मां बनने का अनजान सफर तय करना। लेकिन इन सभी परिस्थितियों को पार कर एक बेटा राजवंश और एक बेटी दिव्यांकुरी जैसा धन पाया।
गरीब व कारीगरों के बच्चों को सीखा रही हुनर
शालिनी ने बताया कि शादी के बाद पॉलिटेक्निक कॉलेज से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद पहली जॉब मैंने अपनी सास की मदद से तीन महीने के बेटे को छोडकऱ एक डिजाइनर लेबल के लिए की। इसी तरह निरंतर एक के बाद एक एक्सपोर्ट हाउस में पर्यवेक्षक व फैशन फैकल्टी रहते हुए निशुल्क सिलाई व परम्परागत कारीगरी को नए अंदाज में सीखाने का प्रशिक्षण देकर विभिन्न गरीब परिवारों व कारीगरों के बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का अवसर मिला। वहीं राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्र (आईटीआई) में बतौर ड्रेस मेकिंग ट्रेड की प्रशिक्षक रहते हुए बहुत सी बच्चियों के मन की बात जानकर उनके हुनर को निखारने का मौका मिला।
फैशन एकेडमी से महिलाओं को दे रही संबल
फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में ग्यारह सालों का अनुभव होने के बाद शालिनी ने फैशन एकेडमी की शुरूआत की। जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं व विद्यार्थियों को नई तकनीक और कोर्सेज से अवगत करवाना हैं। जिससे घरेलू महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें। वे कहती है कि मैं ज्ञान बांटने से ज्ञान बढ़ता है जैसी सोच के साथ ही महिलाओं को संबल देने के लिए विभिन्न तरह के कोर्स के साथ डिजिटल ड्रेस मेकिंग का कोर्स भी करवा रही हूं, जिससे उनको आर्थिक तंगी का सामना ना करना पड़े तथा महंगे कोर्सेज विद्यार्थियों को कम लागत में मिल सके। अब तक हजारों ऐसे परिवारों को हाथ का काम सीखाया हैं, जो घर पर ही सिलाई, कशीदाकारी, बुटीक व रंगाई-छपाई का कार्य कर रहा हैं। वहीं सैंकड़ों महिलाएं राजस्थानी पोशाकों को वर्तमान फैशन के अनुरूप सिलाई करके घर बैठे रोजगार पा रही हैं।