
नौसर (जोधपुर) एक ओर जहां शहीदों ने देश की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर करने में एक क्षण फिजूल नहीं गंवाया, वहीं सरकारें महज उनके नाम के विद्यालय बनाने में सालों लगा रही है। शहीदों के परिजन अपने गांव के विद्यालय का नामकरण कर अपने शहीद को उसमें खोजने को प्रयासरत है तो दूसरी ओर शिक्षा विभाग की नामकरण की नीतियां व सरफऱोशी की याद पर लालफीताशाही की बेडिय़ां टूटने का नाम नही ले रही। नौसर का करगिल शहीद गोरधनराम बरवड़ तीन नवंबर 2000 को करगिल विजय के पश्चात ऑपरेशन रक्षक के रुप में उग्रवादियों के सामने तैनात थे। दो आतंकवादियों को मौत के घाट उतारकर जंग में खुद भी शहीद हो गए। शहीद बरवड़ के नाम सरकारी विद्यालय नामकरण की प्रक्रिया बीस साल बाद भी कागजों में अटकी है जिसे देख ग्रामीणों को सरकारी तंत्र पर तरस आ रहा है।
अटकी फाइल पर हो रहा पत्राचार- महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पुलिस वीरता पदक प्राप्त बरवड़ शहीद के नाम विद्यालय नामकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम तो ग्राम पंचायत प्रस्ताव व सरकारी विद्यालय के संस्था प्रधान का प्रमाणीकरण आवश्यक था, जिसे दो-दो बार भेजे गए। इन बीते सालों में शहीद परिजनों व ग्रामीणों ने पांच सरपंचों का कार्यकाल देख लिया। लेकिन उनके नाम का विद्यालय बने कोई गंभीर नजर नहीं आए। जबकि ग्राम पंचायत द्वारा विद्यालय नामकरण की सहमति का प्रस्ताव भी भेजा है।