
जोधपुर। सेवानिवृत्त जीवन जी रहे 87 वर्षीय गोविंद किशन बोहरा इस बात से व्यथित हैं कि देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और लोगों को, खासकर युवाओं में तिरंगे के प्रति जोश जगाना पड़ रहा है। वे कहते हैं कि समझ में नहीं आता, हर घर तिरंगा अभियान के प्रति लोगों में वैसा स्वतः स्फूर्त जोश क्यों नहीं है, जो उन्होंने देश आजाद होने के पहले और बाद में देखा है।
देश के पहले स्वतंत्रता दिवस और इससे पहले के माहौल को याद करते हुए बोहरा के चेहरे पर वही बचपन लौट आता है, जब वे महज साढ़े 11 साल के थे। यादों के समंदर में गोता लगाते हुए वे कहते हैं कि उस वक्त अंग्रेजों की गुलामी के साथ रियासत का राज था। लोगों को जैसे ही पता पड़ा कि माउंट बैटन आ गए हैं और देश आजाद हो रहा है, वैसे ही लोगों का उत्साह चरम पर पहुंच गया। ये शायद फरवरी 1947 की बात है। इसके बाद से लगातार हर गली-मोहल्ले में तिरंगा उठाए बच्चों-बड़ों की टोलियां दिखाई दे जाती थी। घर घर तिरंगा ध्वज लहराने लगे थे। वे खुद भी बालसखाओं के साथ तिरंगा लेकर देशभक्ति के तराने गाते हुए गलियों में निकल पड़ते थे। एक अलग तरह का ही जोश था। बड़े-बुजुर्ग भी उल्लासित थे कि हम आजाद हो रहे हैं और यह उल्लास हर घर में नजर आता था। हथाइयों पर एक ही चर्चा थी कि 'अबै अंगरेज तो गया अठूं....भारत नै आजाद करनै भाग रह्या है।'
यह कहते कहते वे वर्तमान में लौट आते हैं और इस बात पर अफसोस जताते हैं कि तिरंगा वही है, लेकिन देशभक्ति की भावना जगानी पड़ रही है। लोगों से सरकार को कहना पड़ रहा है कि आजादी की 75वीं वर्षगांठ है। हर घर तिरंगा फहराना चाहिए यानी लोगों में तिरंगे और आजादी के प्रति उत्साह भरने की कोशिश करनी पड़ रही है। यह सोचना पड़ रहा है कि ये नौबत क्यों आ गई? युवा तरुणाई सो क्यों गई?
भर जाता था सर्राफा बाजार
बोहरा के अनुसार स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जोधपुर के सर्राफा बाजार में आंदोलन के अगुवा संगठन मारवाड़ हितकारिणी सभा की बैठकों में जब जयनारायण व्यास, छगनलाल चौपासनीवाला, भंवरलाल सर्राफ व अन्य सैनानी आते थे तो उन्हें सुनने पूरा बाजार खचाखच भर जाता था। दुकानों की छतों तक लोग बैठकर उनके भाषण सुनते थे।
जब नेहरू तमतमा गए
बोहरा बताते हैं कि आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव से पहले जवाहरलाल नेहरू जोधपुर आए थे। उनकी पुराने स्टेडियम में सभा थी। इस दौरान मंच के पास बैठे कुछ लोग बोलने लगे तो नेहरू को गुस्सा आ गया और वे गुस्से से बोल पड़े, 'क्या कर रहे हैं आप लोग?' वे बताते हैं कि उस दौर में लोग खुद ब खुद नेताओं को सुनने जाते थे और आज चुनावी सभाओं में बसों की व्यवस्था करनी पड़ती है।