कानपुर

अखिलेश-मायावती की जोड़ी सुपरहिट, 2019 में 50 सीटों पर मुरझा सकता है कमल

राजनेता मिशन 2019 को फतह करने के लिए अंदरखाने रणनीति बनाने में जुटे हैं...
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Updated: 12 Jul 2018, 9:27 AM IST
Akhilesh Yadav Mayawati gathbandhan effect on BJP in 2019
अखिलेश-मायावती की जोड़ी सुपरहिट, 2019 में 50 सीटों पर मुरझा सकता है कमल

कानपुर. लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बजच चुकी है और सभी राजनीतिक दलों के अंदर शह-मात का खेल भी शुरू हो चुका है। आरोप-प्रत्यारोपों के इतर राजनेता मिशन 2019 को फतह करने के लिए अंदरखाने रणनीति बनाने में जुटे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दो दिवसीय यूपी का दौरा कर वर्तमान हालतों पर मंथन किया और एक रिपोर्ट बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दी। रिपोर्ट में ऐसे तीन दर्जन से ज्यादा सांसद हैं, जिनके काम-काज से हाईकमान खुश नहीं हैं तो वहीं समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच गठबंधन होने पर पार्टी को नुकसान की बात कही गई है। इसी के चलते खुद पीएम नरेंद्र मोदी यूपी में लगातार ताबड़तोड़ रैलियां कर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाएंगे। जबकि अखिलेश, मायावती और राहुल गांधी यूपी में भाजपा को पटखनी देने के लिए एक साथ आ सकते हैं, जिसकी घोषणा जल्द ही बसपा सुप्रीमो मायावती कर सकती हैं। यदि दोनों दल साथ-साथ आते हैं तो यूपी की 80 में से 50 सीटों पर कमल मुरझा सकता है।

तो उठाना पड़ सकता है नुकसान

लोकसभा चुनाव का आगाज हो चुका है। अखिलेश यादव की साइकिल रिपेयरिंग के साथ पूरी तरह से ठीक हो चुकी है और जल्द सड़कों पर दिखेगी तो वहीं हाथी भी पिछले कई चुनावों में शिकस्त खाने के बाद कुछ हद तक 2019 की रेस में आ गया है और अखिलेश को बिठाकर चुनावी दंगल फतह करने के लिए जुटा है। यदि अखिलेश मायावती गठबंधन कर चुनावी अखाड़े में उतरते हैं तो भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के डाटा का विधानसभावार विश्लेषण करने से पता चलता है कि यदि सपा और बसपा के वोटों को जोड़ दिया जाए तो बीजेपी लोकसभा की 50 सीटें हार सकती है। अगर एसपी और बीएसपी के वोटों को एक साथ रखकर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में इस संभावित गठबंधन को 80 लोकसभा सीटों में से 57 सीटें मिलती दिख रही हैं। जबकि बीजेपी के पास मात्र 23 सीटें रह जाती हैं।

बसपा का साथ छोड़ कमल खिलाया

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की अगुवाई में एनडीए ने 80 में से 73 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में सपा और बसपा ने अलग अलग उम्मीदवार खड़े किये थे। मायावती की पार्टी खाता नहीं खोल पाई थी तो वहीं सपा महज पांच सीटों पर सिमट गई थी, जबकि कांग्रेस के खाते में महज दो सीटें आई थीं। भाजपा ने क्षत्रपों को पटखनी देने के लिए पूरी तरह से सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला आजमाया। चुनाव से पहले बसपा के दलित वोटबैंक में जबरदस्त सेंधमारी की थी। 20 से 25 फीसदी गैर जोटव दनित वोटर्स बसपा को छोड़ कमल के साथ चला गया और जिसका परिणाम रहा कि हाथी शून्य पर सिमट गया। यही हाल सपा का भी हुआ। मुस्लिम मतदाता तीनों दलों में बंटा, जबकि ओबीसी वोटर्स बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ आ गया और केंद्र में मोदी सरकार बन गई।

वोटों का आंकड़ा, बीजेपी पर भारी

दीन दयाल इंटर कॉलजे के राजनीति शास्त्र के रिटायर्ड टीचर व राजनीति में अच्छी पकड़ रखने वाले प्रभात श्रीवास्तव बताते हैं कि विधानसभा चुनाव 2017 में भी एसपी और बीएसपी अलग-अलग थीं। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को 47 सीटें मिली जबकि बीएसपी मात्र 19 पर आकर सिमट गई है। उत्तर प्रदेश की 403 सीटों की विधानसभा में बीजेपी ने अपने सहयोगियों के साथ 325 सीटें जीती थीं। कहते हैं, यदि 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा‘बापा को मिले वोटों को अगर हर लोकसभा सीट में जोड़ दिया जाए तो बीजेपी के लिए अगले लोकसभा चुनाव में मुश्किलें खड़ी हो जाती है। श्रीवास्तव ने आंकड़ों को जोड़-घटा कर बताया कि यदि सपा-बसपा के वोटों को जोड़ दिया जाए तो 57 लोकसभा सीटों पर इस गठबंधन को औसतन एक लाख 45 हजार वोटों की बढ़त हासिल हो जाती है। जबकि 23 सीटों पर बीजेपी की औसत बढ़त मात्र 58 हजार वोट है।

यहां भी गठबंधन भारी

प्रभात श्रीवास्तव ने बताया कि लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी जिन 73 लोकसभा सीटों पर चुनाव जीती थी वहां पार्टी की औसत बढ़त 1 लाख 88 हजार वोट थे। आंकड़ों का गणित बताता है कि अगर बसपा और सपा के वोट को जोड़ दिया जाए तो बीजेपी जिन 23 सीटों पर आगे बताई जा रही है उनमें से महज चार वाराणसी, मथुरा, गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर सीटों,पर ही बीजेपी जीत का अंतर एक लाख वोटों से अधिक ले जा सकेगी। श्रीवास्तव ने बताया कि यह सारे आंकड़े 2017 के विधानसभा वोट से लिये गये हैं। 2017 के विधानसभा में सपा और कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा था, इसलिए यह आकलन करते समय जिन सीटों पर समाजवादी पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े नहीं किये थे वहां पर कांग्रेस को मिले वोटों को एसपी का वोट माना गया है।

तो क्षत्रपों को खेल हो जाएगा खत्म

प्रभात श्रीवास्तव कहते हैं कि ये अनुमान आंकड़ों के अलग-अलग संभावनाओं द्वारा लगाये गये हैं। इन आकड़ों को चुनाव में आने वाले नतीजे की एकदम सही तस्वीर नहीं कही जा सकती है। चुनावी गणित और अनुमान, नतीजों के धरातल पर सही उतरते हैं या नहीं यह कई तथ्यों पर निर्भर करता है। इनमें दोनों पार्टी के समर्थकों, वोटरो के बीच सामंजस्य और उनकी इच्छा शक्ति अहम है। कई बार दो दलों के बीच गठबंधन होने की वजह से कई नेताओं के टिकट कट जाते हैं और ऐसे नेता प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गठबंधन के लिए मुश्किलें पैदा करते हैं। प्रभात श्रीवास्तव कहते हैं कि वर्तमान में हालात कुछ हद तक गठबंधन के पक्ष में दिख रहे हैं। हां यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सपा-बसपा की जातिगत राजनीति को ध्वस्थ करने में कामयाब रहे तो फिर यूपी में क्षत्रपों के लिए राजनीति के दरवाजे पूरी तरह से बंद हो जाएंगे।

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