
कानपुर. कांशीराम ने मायावती को सियासत का ककहरा पढ़ाया और पार्टी की बागडोर देकर दलितों के नेता के रूप में पहचान दिलवाई। मुलायम सिंह के चलते सत्ता की खुशबू मिली, लेकिन राजनीति की माहिर खिलाड़ी मायावती ने मुलायम को चित कर यूपी की लीडर बन गई। 2007 में यूपी की जनता ने लखनऊ की कुर्सी पर बिठाया, लेकिन पांच साल के बाद पिता की खोई जमीन पर बेटे अखिलेश ने साइकिल दौड़ाई पर सबसे कम उम्र की सूबे के सीएम बने। इसी के बाद बसपा के पतन शुरू हो गया और 2017 तक बसपा का पूरी तरह से सफाया हो गया। फूलपुर, गोरखपुर और कैराना में मायातवी ने अखिलेश के उम्मीदवारों का समर्थन किया तो सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दोस्ती का हाथ बड़ा दिया। बबुआ को बुआ ने गले लगा लिया और 2019 का चुनाव एक साथ लड़ने का ऐलान कर दिया। लेकिन टिकट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच दूरियां बढ़ गईं और मायावती ने तत्काल कांग्रेस के पंजे का दामन थाम लिया और कर्नाटक के बाद मध्यप्रदेश में दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर, अखिलेश से दूरियां बना लीं। कानपुर आए सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने खुलकर तो गठबंधन पर नहीं बोले, हां उन्होंने कार्यकर्ताओं से इतना जरूर कह गए कि अब हमें 80 में से 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए जुट जाना है।
संगठन की दुस्तीकरण पर फोकस
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का अब गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने से मोहभंग हो गया है। शुक्रवार को कानपुर आए सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने पार्टी के कार्यालय पर इसका संकेत दे दिया। नरेश उत्तम ने साफ कहा कि अब हम सब का ध्यान पार्टी को मजबूत करने पर है। अभी तो किसी भी गठबंधन की बात करना ही बेकार है। नरेश उत्तम ने कहा कि हम समाजवादी लोग दोस्त नहीं बदलते हैं। हम लोगों ने राजनीति में बहुत धोखे खाए हैं। धोखा खाने के बाद बहुत कुछ सीखा है। कहा कि अब तो चुनाव के समय गठबंधन की बात होगी, फिलहाल अभी हमारी पार्टी का मकसद सियासी जमीन मजबूत करने का है। समाजवादी पार्टी अभी तो अपना संगठन को दुरुस्त करने में लगी हुई है। पहले पार्टी को मजबूत करना हमारी जिम्मेदारी है, गठबंधन की बात चुनाव के समय होगी। उन्होंने कहा कि गठबंधन के इंतजार में हम पार्टी को मजबूत करने की प्रक्रिया को नहीं रोक सकते हैं।
अखिलेश भी दे चुके हैं बयान
नरेश उत्तम के पहले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लखनऊ में गठबंधन पर बड़ा बयान दे चुके हैं। उन्होंने कहा था कि समाजवादी लोग राजनीति में धोखा बहुत खाए हैं। हम तो जितना धोखा खाया उतने हम मजबूत हुए हैं। उन्होंने कहा था कि समाजवादी खासकर मैं अपने दोस्त नहीं बदलता हूं। गठबंधन की बात होगी तो जरूर बता देंगे। इस समय अभी फिलहाल हम पार्टी को मजबूत करने में लगे हैं। अभी हमारी पार्टी का मकसद सियासी जमीन पर मजबूत करने का है। इसी के बाद से सपा और बसपा के कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बड़ गई तो वहीं कांग्रेसी हाथी की तरफ दोस्ती का हाथ बड़ा दिया। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष राजाराम पाल ने कहा कि पार्टी हाईकमान जो निर्णय लेगा हमस ब उसका सम्मान करेंगे। पार्टी बसपा के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरेगी तो भाजपा पूरी तरह से यूपी में साफ हो जाएगी। वहीं अन्य कांग्रेसी जो बसपा को कोसा करते थे वह मायावती के पक्ष में खुलकर बोल रहे हैं।
अखिलेश की संजीवनी से ट्रैक पर लौटा हाथी
विधानसभा चुनाव 2012 से लेकर लोकसभा 2014 और 2017 के चुनाव में बसपा को करारी हार उठानी पड़ी। उसका वोटबैंक खिसक कर भाजपा के पाले में चला गया। लोकसभा चुनाव में मोदी का ऐसा जादू चला कि बसपा का खाता तक नहीं खुल सका। वहीं कांग्रेस भी दो सीटों पर सिमट गई, लेकिन समाजवादी पार्टी कुछ हद तक हमना गढ़ बचाने में कामयाब रही। निकाय चुनाव में बसपा को कुछ हद तक फाएदा मिला और इसी के चलते अखिलेश यादव ने गठबंधन का न्योता मायावती को दे दिया। मायावती ने खोई जमीन को हासिल करने के लिए हामी भर दी, लेकिन सीटों के बंटवारे के चलते उन्होंने सपा के बजाए कांग्रेस का दामन थाम लिया। खुद बसपा नेता मानते हैं कि सपा के चुनाव में जाने से पार्टी को फाएदा कम नुकसान ज्यादा उठाना पड़ सकता है।
सपा ने उम्मीदवारों की तलाश की शुरू
गठबंधन टूटने के चलते अखिलेश यादव ने अभी से 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की तलाश तेज कर दी है। यानी अखिलेश यादव चाहते हैं कि वक्त से पहले ही लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों का एलान कर दिया जाए ताकि वो अपनी पूरी ताकत इन चुनाव में झोंक सकें। उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखा जा रहा है। अखिलेश ने अब उत्तर प्रदेश प्रदेश से बाहर भी अपना दायरा बढ़ाने का मन बना लिया है। माना जा रहा है कि इस बार लोकसभा चुनाव में उनका फोकस उत्तराखंड के साथ राजस्थान में भी रहेगा। मानते हैं कि मध्य प्रदेश, झारखंड व छत्तीसगढ़ में समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार है। इस बार समाजवादी पार्टी यूपी के अलावा दूसरे राज्यों में भी भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए तैयार है।
हार्दिक के जरिए पटेल वोटर्स पर नजर
कांग्रेस और बसपा की नजर ओबीसी मतदाताओं पर है। भाजपा के बाद इस समाज को वोट काफी हद तक सपा के पास है और इसे सोनिया और मायावती अपने पाले में लाने के लिए हार्दिक को चुनाव के वक्त प्रचार की कमान दे सकती हैं। खुद कानपुर दौरे परे आए कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपीएन सिंह ने इसकी तरफ संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि हार्दिक पटेल ने कांग्रेस के पक्ष में गुजरात में प्रचार किया और आगे भी वह पार्टी के साथ खड़े रहेंगे। कांग्रेस और बसपा कार्यकर्ताओं की मांग है कि चुनाव के शंखदान के बाद कुर्मी बाहूल्य सीटों पर हार्दिक का उतारा जाया। जिससे के भाजपा और सपा के साथ खड़ा कुर्मी वोट खिसक कर गठबंधन की तरफ आए। राजनीतिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि हार्दिक कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करते हैं तो भाजपा के साथ सपा को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। कुर्मी समाज का यूथ वोटर्स हार्दिक को अपना नेता मानता है और उनके आने से कांग्रेस के साथ ही बसपा को जबरदस्त फाएदा होने की उम्मीद है।