
शैलेन्द्र तिवारी
उम्र की किताब में भले ही साठ, सत्तर या अस्सी के पन्ने जुड़ गए हों, लेकिन दिल अब भी वही है...जो जीत पर खिलखिलाता है और हार के बाद अगली बाजी जीतने का हौसला रखता है। राजस्थान पेंशनर्स समाज कोटा शाखा का खेल पखवाड़ा इसी जज्बे की कहानी बयां कर रहा है। 7 से 15 अगस्त तक चल रहे इस आयोजन में बुजुर्ग पेंशनर्स कैरम की गोटियों पर निशाना साध रहे हैं तो शतरंज की बिसात पर दिमागी घोड़े दौड़ा रहे हैं। बैडमिंटन कोर्ट में रैकेट थामे उत्साह दिख रहा है तो भजन और नृत्य प्रतियोगिताओं में सुर-ताल की महफिल सज रही है।
यह महज खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि जिंदगी के उस दौर में लौटने की कोशिश है, जहां नौकरी की भागदौड़, परिवार की जिम्मेदारियां और वर्षों की व्यस्तता नहीं है। अब पेंशनर्स को खेलों के बहाने अपने भीतर छिपे उस बच्चे को फिर से जीने का मौका मिल रहा है।
खेल पखवाड़े में पेंशनर्स अलग-अलग प्रतियोगिताओं में उत्साह से हिस्सा ले रहे हैं। कैरम, शतरंज, भजन गायन, नृत्य, बैडमिंटन के महिला-पुरुष वर्ग, सिंगल-डबल के साथ कुर्सी दौड़, रुमाल झपट्टा, जलेबी दौड़ और नींबू दौड़ जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं। खास बात यह है कि उम्र यहां किसी के उत्साह के आड़े नहीं आ रही।
जिला कोटा शाखा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरिसूदन शर्मा व घनश्याम शर्मा बताते हैं कि इन प्रतियोगिताओं में असली मुकाबला केवल मेडल या जीत का नहीं है। वर्षों से एक-दूसरे को जानने वाले पेंशनर्स जब मैदान में आमने-सामने होते हैं तो कुछ पल के लिए प्रतिद्वंद्वी जरूर बनते हैं, लेकिन खेल खत्म होते ही फिर वही अपनापन लौट आता है। कोई साथी खिलाड़ी की हौसला अफजाई करता है तो कोई हारने वाले को अगली बाजी जीतने की चुनौती देता है।
जिलाध्यक्ष रमेश चंद गुप्ता कहते हैं कि प्रतियोगिताएं पेंशनर्स को सक्रिय और खुशहाल जीवन से जोड़ने का माध्यम बन रही है। खेल के बहाने पुराने साथी मिल रहे हैं, नई दोस्तियां बन रही हैं और वर्षों पुरानी यादें फिर ताजा हो रही हैं। यहां मैदान में पसीना कम और मुस्कान ज्यादा दिखाई देती है।