
-बारां शहर और कई गांव-कस्बों में तेजादशमी पर लगेंगे मेले
बारां. प्रदेश की लोक संस्कृति में वीर तेजाजी का नाम अपार श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। नागौर जिले के खरनाल गांव में जन्मे तेजाजी को लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। वे केवल वीरता के प्रतीक ही नहीं, बल्कि सत्य, वचनबद्धता और लोककल्याण की भावना के आदर्श भी माने जाते हैं। ग्रामीण राजस्थान में आज भी लोग उन्हें "तेजाजी महाराज" कहकर श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।
गायों की रक्षा के लिए प्राण दिए :
लोक मान्यताओं के अनुसार तेजाजी का जन्म एक जाट परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें साहस, न्यायप्रियता और पशुओं के प्रति करुणा की भावना थी। कहा जाता है कि उस समय क्षेत्र में गोधन की लूट और अत्याचार की घटनाएं बढ़ रही थीं। तेजाजी ने गायों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और इसी दौरान उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनकी यह गाथा आज भी लोकगीतों, भजनों और कथाओं के माध्यम से सुनाई जाती है।
बारां जिले में थानकों पर मेले
प्रदेश में कई जिलों में भादवा महीने की शुक्ल दशमी को तेजादशमी पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है। मेलों का आयोजन होता है। बारां जिले में भी बारां के डोल तालाब की पाळ समेत कई गांव-कस्बों में थानकों पर मेले लगते हैं। श्रद्धालु तेजाजी के थानकों पर ध्वजा चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लोक कलाकार तेजाजी के भजन और वीर गाथाएं प्रस्तुत करते हैं। प्रदेश की लोक आस्था में तेजाजी केवल एक देवता नहीं, बल्कि जनमानस की सांस्कृतिक पहचान और लोकविश्वास के जीवंत प्रतीक हैं। आगामी 21 सितम्बर को जिले में भी तेजादशमी पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।
गूंजेंगे अलगोजे, निकलेगी मंडलियां
अलगोजा प्रदेश का पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र है, जो तेजाजी के मेलों, जागरणों और तेजा दशमी के अवसरों पर विशेष रूप से गूंजता है। बारां जिले में भी बारां समेत गांव-कस्बों में तेजाजी के अलगोजे आने वाले दिनों में गूंजेंगे। तेजादशमी के दिन तो लोक गायकों की मंडलियां दिनभर अलगोजों के साथ दिखती है।
सर्पदंश से रक्षा करने वाले देवताओं में तेजाजी
तेजाजी के जीवन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा उनके वचन पालन की है। मान्यता है कि एक बार उन्होंने एक नाग को वचन दिया था कि कार्य पूरा करने के बाद वे स्वयं उसके पास लौटेंगे। उन्होंने अपना वचन भी पूरा किया था।