यादव और पटेल की नाराजगी से डरी भाजपा, कोटे में कोटा का निर्णय टाला।
लखनऊ. उत्तर प्रदेश में पिछड़ों को अति पिछड़ों में बांटने के राज्य सरकार के मंसूबों पर पानी फिर गया है। योगी मंत्रिमंडल में शामिल दो प्रमुख दल कोटे में भी कोटा को लेकर आमने सामने आ गए हैं। शीतकालीन सत्र में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री सामाजिक न्याय समिति की सिफारिशों को सदन के पटल पर रखने वाले थे लेकिन सरकार के समझाने के बाद उन्होंने अपना कदम पीछे खींच लिया। उधर केंद्र सरकार भी पिछड़ों को तीन वर्गों में बांटने की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
मोर्चा खोल देने से सरकार सकते में है
उत्तर प्रदेश की 79 पिछड़ी जातियों को तीन हिस्से में बांटकर आरक्षण देने की सिफारिश की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग सामाजिक न्याय समिति ने सरकार को सौंप दिया है। लेकिन इस आरक्षण में बड़ा पेंच है। यादव, कुर्मी और जाट जैसी पिछड़ी जातियों में राजनीतिक रसूख रखने वाली जातियों के मोर्चा खोल देने से सरकार सकते में है। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक इन तीन जातियों को सिर्फ सात फीसदी आरक्षण देने की बात की गई है। भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल के अध्यक्ष आशीष पटेल ने रिपोर्ट में खामियां गिना कर अपना विरोध जता दिया है। आशीष पटेल का कहना है कि जातिगत जानगणना कीजिए और जातियों को आबादी के अनुपात में आरक्षण दे दीजिए। वहीं भाजपा के इसी बिरादरी के केंद्रीय मंत्री ने भी रिपोर्ट में खामियां गिना कर अपना विरोध जताया है। उधर सरकार की सहयोगी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने तो रिपोर्ट लागू न होने पर आंदोलन की चेतावनी दे दी है। इन हालातों में लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा सरकार इस पर कोई कार्रवाई करने वाली नहीं है।
लेकिन भाजपा को यह डर है कि...
भाजपा भी चाहती है कि यूपी में इस रिपोर्ट को मास्टर स्ट्रोक के तौर पर अपनाया जाए। लेकिन भाजपा को यह डर है कि अगर रिपोर्ट की सिफारिशों को मान लिया गया तो विधानसभा की 34 और लोकसभा की 8 सीटों पर सीधा प्रभाव रखने वाली कुर्मी बिरादरी नाराज हो जाएगा। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कुर्मी बिरादरी ने भाजपा और उसके सहयोगी अपन दल को वोट दिया था। वहीं सपा इस बिरादरी के बेनी प्रसाद वर्मा का पहले ही घर वापसी करा कर इस बिरादरी पर डोरे डाल रही है।
35 प्रतिशत में 13 यादव तो 12 फीसदी कुर्मी हैं
उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के वोट बैंक पर नजऱ डालें तो यह कुल 35 फीसदी है, जिसमें 13 फीसदी यादव, 12 फीसदी कुर्मी और 10 फीसदी अन्य जातियों के लोग आते हैं। पिछड़ी जातियों में यादव १३ प्रतिशत और कुर्मी १२ प्रतिशत हैं। इन दोनों जातियां यूपी में राजनीतिक रसूख रखने वाली हैं। अब यूपी में यादव वोट सपा का माना जता है वहीं कुछ कुर्मी वोट भाजपा के साथ हैं तो कुछ अपना दल और अन्य के साथ हैं। वहीं सपा ने कुर्मी विरादरी के बड़े नेता बेनी प्रसाद वर्मा को पहले ही अपने पाल में कर लिया है। उन्हें राज्यसभा भेजवा दिया।
योगी सरकार ने जून में किया था समिति का गठन
यूपी की सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा कदम उठाते हुए पिछड़ी जातियों के विभाजन के लिए एक कमेटी का गठन किया था। उत्तर प्रदेश पिछड़ावर्ग सामाजिक न्याय समिति का गठन जून, 2018 को किया गया था और उसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए दो महीने का समय दिया गया था। इसकी अध्यक्षता रिटायर्ड जस्टिस राघवेंद्र कुमार को सौंपी गई। अब समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है, इसने उत्तर प्रदेश की 79 पिछड़ी जातियों को तीन हिस्से में बांटकर आरक्षक्ष देने की सिफारिश की है।
क्या कहती है रिपोर्ट
समिति ने अपनी रिपोर्ट में पिछड़ी जातियों को पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग तीन कटेगरी में बांटा है। पहली कटेगरी में कुर्मी, यादव, चौरसिया को रखा गया है, दूसरी में कुशवाहा, शाक्य, लोध, शाहू, तेली, गुज्जर, माली आदि जातियां हैं, तीसरी कटेगरी में राजभर, मल्लाह, बिंद घोसी, कुरैशी आदि जातियां को रखा गया है। पहली कटेगरी को 7 प्रतिशत, दूसरी को 11 प्रतिशत और तीसरी को 9 प्रतिशत रिज़र्वेशन देने की सिफारिश की गई है।
यह है भाजपा का तर्क
भाजपा ने कहा है कि इस आयोग के बनने से अति पिछड़ी जातियों को न्याय मिल पाएगा। आयोग के गठन के पीछे तर्क यह है कि ओबीसी में शामिल पिछड़ी जातियों में पिछड़ापन समान नहीं है। इसलिए ये जातियां आरक्षण का लाभ समान रूप से नहीं उठा पातीं। कुछ जातियों को वंचित रह जाना पड़ता है। इसलिए ओबीसी श्रेणी का बंटवारा किया जाना चाहिए। देश के सात राज्यों में पिछड़ी जातियों में पहले से ही बंटवारा है।
केंद्र की राह पर योगी सरकार
बतादें कि ऐसी ही एक कवायद केंद्र सरकार भी कर चुकी है। 2 अक्टूबर, 2017 को केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत एक आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की। इस आयोग को तीन काम सौंपे गए हैं- एक, ओबीसी के अंदर विभिन्न जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिला, इसकी जांच करना।
दो, ओबीसी के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करना, और तीन, ओबीसी को उपवर्गों में बांटने के लिए उनकी पहचान करना। इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 12 हफ्ते का समय दिया गया। आयोग की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश जी. रोहिणी को सौंपी गई हैं। लेकिन जिस रोहिणी कमीशन को अपनी रिपोर्ट 12 हफ्ते में दे देनी थी, वो रिपोर्ट 12 महीने बाद भी नहीं आई है। अब इस आयोग को रिपोर्ट देने के लिए 31 मई, 2019 तक का समय दे दिया गया है। इससे यह ज़ाहिर है कि केंद्र सरकार भी ओबीसी के बंटवारे पर कोई फैसला नहीं करना चाहती। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार भी इस मामले में केंद्र सरकार के रास्ते पर चल रही है।