डेंगू के मरीजों की प्लेटलेट्स की कमी से होने वाली मौतों को रोकना अब आसान हो जायेगा।
लखनऊ. डेंगू के मरीजों की प्लेटलेट्स की कमी से होने वाली मौतों को रोकना अब आसान हो जायेगा। ब्लड बैंक में नई तकनीक से तैयार प्लेटलेट्स चढ़ाये जाने के बाद मरीज को रिकवर होने में कम समय लगता है। डेंगू पीड़ित मरीज में सबसे पहले शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से घटने लगती है और समय पर इलाज न मिलने के कारण मरीज की जान खतरे में पड़ जाती है। चिकित्सा विज्ञान के जानकर बताते हैं कि अभी तक मरीज के लिए सिंगल डोनर प्लेटलेट्स प्रक्रिया से प्लेटलेट्स चढ़ाई जाती है। इस प्रक्रिया में मरीज के ब्लड ग्रुप से मेल खाने वाले व्यक्ति का ही प्लेटलेट्स बीमार व्यक्ति को चढ़ाया जाता है।
बफी कोट ऑफ प्लेटलेट्स है नई तकनीक का नाम
नई तकनीक को बफी कोट ऑफ प्लेटलेट्स कहा जाता है। इस नई तकनीक में पांच से सात यूनिट प्लेटलेट्स को आपस में ख़ास तकनीक से मिलाकर मरीज के ग्रुप का प्लेटलेट्स तैयार किया जाता है। इस नई तकनीक से मरीज के ग्रुप का प्लेटलेट्स तैयार हो जाता है। इस प्लेटलेट्स को चढाने के बाद 15 से 20 हज़ार प्लेटलेट्स काउंट बढ़ जाते हैं। इस नई तकनीक में पांच से सात हज़ार रूपये खर्च आता है। दूसरी ओर एसडीपी तकनीक 12 से 15 हज़ार रूपये का खर्च आता है।
15 से 20 हज़ार बढ़ जाता है प्लेटलेट्स काउंट
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की प्रभारी डाक्टर तूलिका चंद्रा ने बताया कि डेंगू से पीड़ित मरीज के शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से घटती है। इस नई तकनीक से मरीज के शरीर में 15 से 20 हज़ार प्लेटलेट्स काउंट बढ़ाया जा सकता है। पुरानी तकनीक की तुलना में इस नई तकनीक पर मरीजों को खर्च भी कम करना पड़ेगा। बफी कोट पोलिंग ऑफ प्लेटलेट्स तकनीक से सात यूनिट प्लेटलेट्स को आपस में खास तकनीक से मिलाया जाता है और उससे मरीज के ब्लड ग्रुप का प्लेटलेट्स तैयार होता है।
खून की कमी पर ध्यान देने की जरूरत
चिकित्सक मानते हैं कि कई बार व्यक्ति सेहतमंद दिखाई पड़ते हैं लेकिन उनमें खून की कमी होती है। खून की कमी ऐसी समस्या है जिस पर ध्यान न देने पर लगातार बनी रहती है। चिकित्सा विज्ञानी इस बीमारी को ऑटो इम्यून हीमोलिपिक एनीमिया कहते हैं। इसमें मरीज का खून अपने आप नष्ट होने लगता है और शरीर पीला पड़ने लगता है। इस बीमारी की पहचान कूम्बस जांच प्रणाली से की जा सकती है। यदि समय से इस बीमारी की पहचान कर ली जाए तो इसका इलाज किया जा सकता है।