
UP Politics: लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के मुखिया चिराग पासवान अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेशचुनाव में बड़ी बाजी मारने की तैयारी में हैं। एक तरफ जहां उनकी नजर दलित वोटों पर है। वहीं, दूसरी तरफ योगी सरकार से नाराज चल रहे ब्राह्मणों को भी साधने में जुटे हैं। पासवान भाजपा के सहयोगी हैं और मोदी सरकार में उन्हें खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, पासवान इससे खुश यही हैं। वह कोई बड़ा और दमदार मंत्रालय चाहते हैं। पासवान जानते हैं कि उनकी चाहत आसानी से पूरी नहीं होगी, क्योंकि उनके पास मोलभाव करने के लिए कुछ खास नहीं है। इसलिए उत्तर प्रदेश में लोक जनशक्ति पार्टी की स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। अगर यूपी में LJP कोई कमाल दिखा पाती है, तो भाजपा सहयोगियों के बीच उनका कद बढ़ जाएगा और जाहिर है ऐसे में वह मोलभाव करने की बेहतर स्थिति में आ जाएंगे।‘
चिराग पासवान ने यूपी के लिए अपना एजेंडा सेट कर लिया है। उन्हें अखिलेश यादव के पक्ष में जाने वाले दलित वोटों में सेंध लगानी है और योगी सरकार से नाराज ब्राह्मणों को अपनी तरफ लाना है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) ने दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में कर लिया था। इसका असर भाजपा के प्रदर्शन पर भी पड़ा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकसभा सीटों की संख्या घटकर 33 रह गई, जबकि 2019 में पार्टी ने यहां 62 सीटें जीती थीं।
सूत्र बताते हैं कि बिहार की LJP उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश में लगी है। पार्टी पिछले एक साल से जमीनी स्तर पर काम कर रही है। संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ बूथ समितियां गठित की जा रही हैं। पार्टी का ध्यान पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी पर ज्यादा है, जहां पासी और पासवान समुदाय की आबादी अच्छी-खासी है। पूर्वांचल में LJP के पास पहले से ही 2 लाख से अधिक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है और अब सेंट्रल यूपी में भी इसी तरह का संगठनात्मक ढांचा तैयार किया जा रहा है। इन क्षेत्रों में बूथ समितियों का गठन जल्द पूरा होने की उम्मीद है।
दलितों से जुड़ने के लिए पार्टी ने पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में दलित चौपालों का आयोजन शुरू कर दिया है। इसके अलावा पार्टी पदयात्राएं निकालने की भी योजना बना रही है। पार्टी नेताओं का मानना है कि राज्य में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के कमजोर पड़ने से दलित वोट बैंक अब अपने लिए नया आका तलाश रहा है और ऐसे में लोकजन शक्ति पार्टी के पास भी उन्हें आकर्षित करने का मौका है। बिहार से नजदीकी के कारण पूर्वांचल में पासी और पासवान समुदाय की अच्छी-खासी आबादी है, जो पार्टी के लिए प्लस पॉइंट हो सकता है। बता दें कि यूपी में करीब 21 प्रतिशत दलित हैं। जाटवों के बाद पासी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दलित समुदाय है। वे राज्य की दलित आबादी का लगभग 16 प्रतिशत और प्रदेश की कुल आबादी का करीब 3.5 प्रतिशत है।
दलितों के अलावा, चिराग पासवन की नजर ब्राह्मण वोट बैंक पर भी है। माना जा रहा है कि ब्राह्मण समुदाय का एक वर्ग योगी आदित्यनाथ सरकार से नाराज है। इसी को ध्यान में रखते हुए पासवान ने उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए एक नारा भी तैयार किया है: “पंडित-पासी-पासवान, धरती गूंजे आसमान”। यह नारा बिहार में पार्टी के नारे “धरती गूंजे आसमान, रामविलास पासवान” की तर्ज पर तैयार किया गया है। पार्टी ब्राह्मणों को अपने साथ लाने के लिए विभिन्न जिलों के मंदिरों में चाणक्य चौपाल आयोजित कर रही है। इस पहल का उद्देश्य पार्टी के सामाजिक आधार को और व्यापक बनाना है। वैसे, उत्तर प्रदेश में LJP का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। पार्टी ने सबसे बेहतर प्रदर्शन 2002 के विधानसभा चुनाव में किया था। जब राजा राम पांडेय ने गडवारा सीट से जीत दर्ज की थी।
इसके अलावा, पार्टी ने निर्दलीय उम्मीदवार धनंजय सिंह का भी समर्थन किया था, जिन्होंने जौनपुर की रारी सीट से जीत हासिल की थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन नहीं हो पाने के बाद LJPने अकेले चुनाव लड़ा, लेकिन एक सीट भी नहीं जीत पाई। इसके महज 0.01 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि, चिराग पासवान इतिहास नहीं बल्कि मौजूद संभावनाओं पर ज्यादा विश्वास करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दलित और ब्राह्मण को साधकर वह अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं। अगर पासवान की रणनीति कामयाब होती है और पार्टी को यूपी में कुछ अच्छा कर पाती है, तो केंद्र में वह अच्छे से मोलभाव कर पाएंगे।