
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (फोटो पत्रिका नेटवर्क)
Patrika Chief Editor Gulab Kothari: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि स्त्री केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि उसके संस्कार, चेतना और भविष्य की आधारशिला है। परिवार की वास्तविक शक्ति स्त्री में समाहित होती है और संतान को संस्कार देकर उसे मनुष्य बनाने का सबसे बड़ा दायित्व भी उसी का है। शुक्रवार को बाराबंकी स्थित श्रीरामस्वरूप मेमोरियल विश्वविद्यालय में ‘स्त्री : देह से आगे’ विषय विवेचन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मां अपनी संतान को जो संस्कार देती है, वही आगे चलकर समाज और देश की दिशा तय करते हैं। इसलिए बेटियों को केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण की शक्ति के रूप में देखना चाहिए।
प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि भारतीय समाज की विशेषता रही है कि यहां जीवन को उसकी गहराई और समग्रता में समझने का प्रयास किया गया। स्त्री परिवार और आने वाली पीढ़ियों को लेकर जिस तरह के सपने देखती है, वैसी संवेदना पुरुष में सामान्यतः नहीं होती। प्रकृति ने स्त्री को ममता, प्रेम और पोषण की विशिष्ट क्षमता दी है। यही क्षमता उसे केवल एक भूमिका नहीं, बल्कि परिवार और समाज की दिशा तय करने वाली शक्ति बनाती है।
उन्होंने कहा कि स्त्री केवल रूप या देह नहीं है। वह चेतना है, जो विचारों को जन्म देती है, संस्कारों को संवारती है और भविष्य को आकार देती है। उसकी शक्ति शरीर से आगे मन, बुद्धि और आत्मा की गहराइयों में निहित है। समस्या यह है कि हम स्त्री की इस व्यापक शक्ति को समझने के बजाय उसे केवल शरीर तक सीमित कर देते हैं।
कोठारी ने कहा कि भारतीय चिंतन में पिछले जन्मों के कर्म और संस्कारों का सिद्धांत रहा है। मां को संतान की ‘त्रिकाल दर्शिका’ इसलिए कहा जा सकता है कि वह उसके व्यवहार, स्वभाव और संभावनाओं को गहराई से समझती है। संतान को इंसान बनाने की प्रक्रिया मां से शुरू होती है। समाज को केवल ‘पुरुष प्रधान’ कहकर स्त्री की भूमिका को अलग नहीं किया जा सकता। स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन आज समाज में संतुलन का अभाव दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा के रूप में जो ज्ञान हमें मिलता है, वह मुख्यतः बाहरी ज्ञान है। हम बार-बार शरीर की बात करते हैं, जबकि स्त्री की वास्तविक शक्ति उसके भीतर है। दिव्यता, वात्सल्य, माधुर्य, पोषण और निर्माण की क्षमता स्त्री का स्वरूप है। वह पति को संतान में रूपांतरित करती है और गर्भ में आए जीव को संस्कार देकर मानवता से जोड़ती है। उसके भीतर आए जीव के संस्कारों और उसकी प्रकृति को समझकर उसे जीवन जीने योग्य बनाना स्त्री की बड़ी भूमिका है। पशुता से मानवता की ओर ले जाने का यह परिष्कार ही स्त्री की दिव्यता का बड़ा स्वरूप है।
कोठारी ने कहा कि स्त्री मन की भाषा समझती है। अभिमन्यु का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गर्भ में रहते हुए भी बालक तक संस्कार और ज्ञान पहुंचने की भारतीय अवधारणा रही है। गर्भाधान के साथ ही मां को अपने भीतर एक नए जीवन की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। यह विशिष्ट शक्ति प्रकृति ने स्त्री को दी है। पुरुष की शक्ति में भी स्त्री की भूमिका को हमने भुला दिया है और इसके बावजूद महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं।
उन्होंने कहा कि विवाह के बाद स्त्री केवल एक व्यक्ति की पत्नी नहीं रहती, बल्कि पूरे परिवार की शक्ति उसके साथ जुड़ती चली जाती है। परिवार के रिश्तों को जोड़ना, उन्हें पोषण देना और अगली पीढ़ी को संस्कार देना ही उसके सशक्त होने का वास्तविक स्वरूप है। महिला सशक्तिकरण को केवल आर्थिक या बाहरी स्वतंत्रता के दायरे में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि जीवन में सुख चाहिए तो मन को ताकतवर बनाना होगा। मन ही वास्तविक शक्ति है। मां और दादी के पास बैठकर जब व्यक्ति अपने मन की बात करता है तो वह केवल अपनी समस्या साझा नहीं करता, बल्कि जीवन को समझने की दृष्टि भी प्राप्त करता है।
इससे पहले विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विजय तिवारी ने स्वागत उद्बोधन दिया। कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव प्रो. हेमेंद्र शर्मा ने आभार व्यक्त किया।
स्त्री का वास्तविक स्वरूप उसकी देह नहीं, उसकी चेतना है। ममता, वात्सल्य, पोषण, निर्माण और संस्कार देने की क्षमता उसे परिवार और समाज की केंद्रीय शक्ति बनाती है। संतान को केवल जन्म देना नहीं, उसे संस्कार देकर मानवता के योग्य बनाना स्त्री की सबसे बड़ी भूमिका है।
परिवार की शक्ति स्त्री में समाहित होना ही उसका वास्तविक सशक्तिकरण है। कोठारी के अनुसार स्त्री को सशक्त बनाने की चर्चा केवल आर्थिक स्वतंत्रता या बाहरी अधिकारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। परिवार, संस्कार, संवेदना और अगली पीढ़ी के निर्माण में उसकी निर्णायक भूमिका को समझना भी उतना ही जरूरी है।
Updated on:
21 Aug 2026 08:34 pm
Published on:
21 Aug 2026 05:34 pm
