लखनऊ

भारतीय संस्कृति बनाम मॉडर्न लाइफस्टाइल: युवाओं के चरित्र पर संतों की टिप्पणी कितनी जायज?

हाल के दिनों में चर्चित संत प्रेमानंद महाराज और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज के लड़कियों को लेकर दिए गए बयानों ने देशभर में बहस छेड़ दी है। इन बयानों में पश्चिमी सभ्यता को लेकर चिंता जताई गई है और यह दावा किया गया है कि आधुनिक लड़कियां भारतीय संस्कारों और परंपराओं से भटक रही हैं। सवाल उठता है कि क्या ऐसे बयान आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उचित हैं?

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Jul 29, 2025
संत प्रेमानंद महाराज और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज के लड़कियों को लेकर दिए गए बयानों ने देशभर में बहस छेड़ दी है।PC-AI

अनिरुद्धाचार्य महाराज के विवादित बयान के बाद अब संत प्रेमानंद महाराज अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर संत प्रेमानंद महाराज का वीडियो वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में प्रेमानंद महाराज लड़के और लड़कियों के चरित्र पर टिप्पणी कर रहे हैं।

यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारतीय समाज तेजी से पश्चिमी संस्कृति, विचारों और जीवनशैली की ओर अग्रसर हो रहा है। सामाजिक संरचना में तेजी से बदलाव आ रहे हैं, खासकर युवाओं के बीच। ‘डेटिंग कल्चर’, ‘सिचुएशनशिप’ और ‘बेंचिंग’ जैसी अवधारणाएं शहरी युवा वर्ग में आम हो चुकी हैं। ऐसे में जब संत समाज की तरफ से इस प्रकार के बयान सामने आते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या ये विचार प्रासंगिक हैं, या फिर यह महज एक पीढ़ीगत टकराव है?

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समर्थन और विरोध की दो धाराएं

प्रेमानंद महाराज के बयान को लेकर संत समुदाय में भी मतभेद उभरकर सामने आए हैं। हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने खुलकर प्रेमानंद महाराज का समर्थन करते हुए कहा कि “समाज में अर्धनग्नता बढ़ रही है, जो चिंताजनक है। संतों का काम समाज को आईना दिखाना है।” वे मानते हैं कि प्रेमानंद महाराज का उद्देश्य समाज को सतर्क करना है, न कि किसी विशेष वर्ग को निशाना बनाना।

प्रतीकात्मक तस्वीर AI से बनाई गई है।

वहीं, सरयू आरती समिति के अध्यक्ष शशिकांत दास का रुख इससे अलग है। उन्होंने संत प्रेमानंद को सलाह देते हुए कहा कि “आपके लाखों अनुयायी हैं। ऐसे में आपके शब्द समाज पर असर डालते हैं। आपको संयमित और संतुलित भाषा का प्रयोग करना चाहिए।”

युवाओं की प्रतिक्रिया

इस पूरे विवाद में युवाओं की प्रतिक्रिया सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि टिप्पणी उन्हीं के जीवनशैली पर केंद्रित है। एक वर्ग ऐसा है जो इसे संतों की कट्टर सोच मानता है। उनका कहना है कि “हर लड़की के चरित्र पर सवाल उठाना अनुचित है। समाज में पुरुष और महिला दोनों को बराबरी से समझा जाना चाहिए। प्रेम, रिश्ते और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ‘व्यभिचार’ कहना संकीर्ण सोच को दर्शाता है।”

वहीं कुछ युवाओं ने यह भी माना कि “पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण से पारंपरिक मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं, लेकिन इसका समाधान सार्वजनिक चरित्र विश्लेषण नहीं है। संतों को मार्गदर्शक की भूमिका में रहते हुए अपने विचारों को ज्यादा संवेदनशीलता और संतुलन के साथ रखना चाहिए।”

पश्चिमी सभ्यता बनाम भारतीय परंपरा

इस पूरे विवाद के मूल में भारतीय परंपरा और पश्चिमी सभ्यता के बीच द्वंद छिपा हुआ है। भारतीय संस्कृति में पवित्रता, विवाह की संकल्पना और स्त्री के सम्मान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। लेकिन आज की पीढ़ी वैश्विक संपर्क और आधुनिक सोच के कारण रिश्तों को अलग नजरिए से देखने लगी है। प्रेम, संबंध और जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता को वे अधिकार समझते हैं, जबकि पुरानी पीढ़ी इसे नैतिक पतन मानती है।

इस दृष्टिकोण का संतों के विचारों से टकराना स्वाभाविक है, लेकिन इस टकराव को संवाद से ही सुलझाया जा सकता है। बयानबाज़ी और चरित्र हनन जैसी बातें समाज में और अधिक वैमनस्य पैदा करती हैं।

Updated on:
29 Jul 2025 03:08 pm
Published on:
29 Jul 2025 03:07 pm
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