लखनऊ

हाईकोर्ट जज पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से हलचल, ओउध बार ने CJI से दखल की मांग

Oudh Bar Association ने Supreme Court of India द्वारा Allahabad High Court के न्यायाधीश पर की गई कथित कठोर टिप्पणियों पर आपत्ति जताई है। एसोसिएशन ने CJI से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि ऐसी टिप्पणियां न्यायिक मनोबल और स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती हैं।

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Feb 19, 2026
ओउध बार एसोसिएशन ने CJI से की हस्तक्षेप की मांग, कहा,टिप्पणियां न्यायिक मनोबल पर डालती हैं असर     (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group) 

Oudh Bar: न्यायपालिका के भीतर गरिमा, संतुलन और संस्थागत सम्मान को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। Oudh Bar Association ने भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा Allahabad High Court के एक न्यायाधीश के आदेश पर की गई कठोर टिप्पणियों पर गंभीर आपत्ति जताई है। बार एसोसिएशन का कहना है कि अपीलीय अधिकार क्षेत्र में आदेशों की समीक्षा और निरस्तीकरण न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत या “कलंकित करने वाली” टिप्पणियां न्यायाधीशों के मनोबल और न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।

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क्या है पूरा मामला

यह विवाद दहेज मृत्यु से जुड़े एक जमानत मामले से शुरू हुआ। मामला Chetram Verma v. State of UP शीर्षक से सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति JB Pardiwala और न्यायमूर्ति KV Viswanathan शामिल थे, ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को निरस्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में हाईकोर्ट के आदेश को “सबसे चौंकाने और निराशाजनक आदेशों में से एक” बताया। शीर्ष अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam) की धारा 118 के तहत लागू वैधानिक अनुमान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

यह आपराधिक मामला 22 वर्षीय महिला की मृत्यु से जुड़ा था, जिसकी शादी के तीन माह के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटने से दम घुटने (asphyxia due to strangulation) को मृत्यु का कारण बताया गया था। हाईकोर्ट ने आरोपी की पूर्व हिरासत और साफ आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए जमानत दी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर त्रुटि मानते हुए जमानत रद्द कर दी।

न्यायाधीश का स्वयं को अलग करना

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने एक अन्य जमानत मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग (recuse) कर लिया। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत की टिप्पणियों का उनके न्यायिक मन पर “डिमोरलाइजिंग और चिलिंग इफेक्ट” पड़ा है। इतना ही नहीं, उन्होंने अनुरोध किया कि भविष्य में उन्हें जमानत से जुड़े मामलों की सूची न दी जाए। इस कदम ने न्यायिक समुदाय में व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

ओउध बार एसोसिएशन की आपत्ति

18 फरवरी को लिखे गए पत्र में Oudh Bar Association ने CJI से अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को ऐसे प्रतिकूल व्यक्तिगत टिप्पणियों से परहेज करने की सलाह दी जाए। पत्र में कहा गया है कि अपीलीय अदालतों को आदेश पलटने का अधिकार है, लेकिन किसी न्यायाधीश की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली टिप्पणियां व्यापक स्तर पर न्यायिक कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकती हैं। एसोसिएशन ने लिखा, “ऐसी टिप्पणियां संबंधित न्यायाधीश की न्याय वितरण क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, जबकि बार के सदस्य उनके कार्य की सराहना करते हैं।”

लंबित मामलों का दबाव

पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्य स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। यह अदालत लखनऊ और प्रयागराज,दोनों स्थानों से संचालित होती है और वर्तमान में स्वीकृत पदों की तुलना में कम न्यायाधीशों के साथ कार्य कर रही है। मुकदमों की बढ़ती संख्या और लंबित मामलों का दबाव पहले से ही न्यायाधीशों पर भारी है। ऐसे में अपीलीय टिप्पणियां उनके आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। एसोसिएशन ने कहा कि न्याय व्यवस्था दो समानांतर पहियों पर चलती है-एक, न्यायाधीशों की निष्पक्षता और दूसरा, वादियों का विश्वास। यदि किसी स्तर पर मनोबल प्रभावित होता है, तो उसका असर पूरी प्रणाली पर पड़ सकता है।

न्यायिक स्वतंत्रता बनाम अपीलीय समीक्षा

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, उच्चतम न्यायालय को निचली अदालतों के आदेशों की समीक्षा करने और आवश्यक होने पर उन्हें पलटने का पूर्ण अधिकार है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों के बीच संस्थागत सम्मान बना रहे। अदालतों के बीच स्वस्थ संवाद और संतुलित भाषा न्यायिक गरिमा का हिस्सा मानी जाती है। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मत है कि कठोर टिप्पणियां असाधारण परिस्थितियों में की जाती हैं, लेकिन उनका दायरा सीमित और संदर्भित होना चाहिए।

व्यापक असर

यह मामला केवल एक जमानत आदेश तक सीमित नहीं रहा। इसने न्यायपालिका के भीतर संवाद, संवेदनशीलता और भाषा की मर्यादा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्वयं को असहज या हतोत्साहित महसूस करते हैं, तो इसका प्रभाव न्यायिक कार्य की गति और गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

पत्र की प्रमुख मांग

ओउध बार एसोसिएशन ने अपने पत्र में 9 फरवरी के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में की गई टिप्पणियों की समीक्षा और उन्हें हटाने (expunge) का अनुरोध किया है। पत्र पर एसोसिएशन के अध्यक्ष एस. चंद्र और महासचिव ललित किशोर तिवारी के हस्ताक्षर हैं।

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