लखनऊ

लिटरेरी फेस्ट में कन्हैया से धक्कामुक्की पर लेखकों ने जताई नाराजगी

लेखकों ने विरोध के इस तरीके पर आपत्ति जताई है।
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Nov 11, 2017
Kanhaiya Kumar

लखनऊ. राजधानी लखनऊ में आयोजित लिटरेरी फेस्टिवल में जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के कार्य्रकम के दौरान एबीवीपी कार्यकर्ताओं की धक्कामुक्की और नारेबाजी को लेकर बुद्धिजीवियों और लेखकों ने विरोध के तौर तरीके पर सवाल खड़े किये हैं। कई लेखकों ने विरोध के इस तरीके पर आपत्ति जताई है। लमही पत्रिका के सम्पादक और लेखक विजय राय ने कहा कि किसी को सुने बिना उसकी खिलाफत कैसे की जा सकती है। सुनने के बाद किसी बात से असहमति हो तो आयोजकों से कहकर अपनी बात रखनी चाहिए। आयोजक इस बात का मौका जरूर देगा कि असहमत लोगों को अपनी बात रखने का मौक़ा मिले। किसी को बलपूर्वक उसकी बात कहने से रोकना ठीक नहीं है।

कन्हैया को लेकर बवाल करने वाले लोगों की मंशा पर सवाल

लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल में जो कुछ भी हुआ, उसके लेकर बुद्धिजीवी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं। कहानीकार किरण सिंह कहती हैं कि यह विरोध का लोकतान्त्रिक तरीका नहीं है। किसी भीड़ को कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है। दरअसल एक एक सोची समझी साजिश के तहत किया गया है जिससे गैर कानूनी तरीके से किसी को बोलने से रोका जाये और सरकार की जवाबदेही का सवाल उठने पर इसे भीड़ का कारनामा करार देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाये।

असहमति के लोकतान्त्रिक तरीकों की पैरवी

शायर संजय मिश्रा 'शौक' कहते हैं कि ये लोग वामपंथी राजनैतिक विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं। साहित्य के आयोजनों में ऐसे लोगों को नहीं बुलाना चाहिए। इसके बावजूद विरोध का जो तरीका अपनाया गया, वह ठीक नहीं है। मारना-पीटना हमारे जंगली होने से सभ्य होने के बीच तय किये गए सफर को शून्य कर देता है। विरोध प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं।

Published on:
11 Nov 2017 06:40 pm
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