
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने हाल ही में आतंकियों के ठिकानों पर सटीक कार्रवाई को लेकर ब्रह्मोस मिसाइल का जिक्र किया। उन्होंने अपने एक हालिया बयान में कहा कि हम अब इतने सक्षम हैं कि ब्रह्मोस मिसाइल से इसके बाद एक बार फिर ब्रह्मोस चर्चा के केंद्र में आ गई है। भारत की यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल आज दुनिया की सबसे खतरनाक और भरोसेमंद मिसाइल प्रणालियों में गिनी जाती है। इसकी खासियत सिर्फ इसकी रफ्तार नहीं, बल्कि दुश्मन के ठिकानों को बेहद सटीकता के साथ निशाना बनाने की क्षमता भी है।
ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस ने भारत की सैन्य ताकत को नई पहचान दी है। खास बात यह है कि अब इस मिसाइल का निर्माण और इंटीग्रेशन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी किया जा रहा है, जिससे राज्य देश के रक्षा उत्पादन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है।
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत और रूस ने मिलकर विकसित किया है। यह दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है। इसकी गति ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना यानी मैक 2.8 से मैक 3 तक पहुंच सकती है।
यह मिसाइल जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी, चारों प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है। यही वजह है कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के लिए यह एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुकी है।
ब्रह्मोस का सबसे बड़ा गुण इसकी सटीकता है। यह दुश्मन के सैन्य ठिकानों, कमांड सेंटर, रडार स्टेशन, एयरबेस, युद्धपोत और आतंकवादी ठिकानों को अत्यंत सटीकता के साथ निशाना बना सकती है। इसकी उड़ान इतनी तेज होती है कि दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का बहुत कम समय मिलता है।
ब्रह्मोस की कहानी 1990 के दशक में शुरू होती है। हालांकि इसकी नींव उससे भी पहले पड़ चुकी थी। 1980 के दशक में भारत ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) शुरू किया था। इसी कार्यक्रम के तहत पृथ्वी, आकाश और नाग जैसी मिसाइलों का विकास हुआ। लेकिन उस समय भारत के पास ऐसी क्रूज मिसाइल नहीं थी जो कम ऊंचाई पर उड़ते हुए दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला कर सके।
1991 के खाड़ी युद्ध ने दुनिया को क्रूज मिसाइलों की ताकत दिखाई। अमेरिका ने जिस तरह लंबी दूरी से सटीक हमले किए, उससे भारत ने भी महसूस किया कि भविष्य के युद्धों में ऐसी तकनीक बेहद जरूरी होगी। इसके बाद भारत ने रूस के साथ इस दिशा में बातचीत शुरू की।
फरवरी 1998 में मॉस्को में भारत और रूस के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर-सरकारी समझौता हुआ। उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO के प्रमुख थे। उन्होंने रूस की एनपीओ माशिनोस्त्रोयेनिया (NPO Mashinostroyenia) के साथ मिलकर एक संयुक्त परियोजना शुरू करने का निर्णय लिया। इसी समझौते के बाद 'ब्रह्मोस एयरोस्पेस' नामक संयुक्त उद्यम की स्थापना हुई।
इस कंपनी में भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूस की हिस्सेदारी 49.5 प्रतिशत रखी गई। यह साझेदारी आज भी दुनिया की सबसे सफल रक्षा तकनीकी साझेदारियों में मानी जाती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि ब्रह्मोस नाम दो देशों की नदियों से मिलकर बना है। 'ब्रह्म' भारत की ब्रह्मपुत्र नदी से लिया गया है, जबकि 'मोस' रूस की राजधानी मॉस्को से होकर बहने वाली मोस्कवा नदी से लिया गया है। इसी वजह से इस मिसाइल का नाम ब्रह्मोस रखा गया, जो भारत और रूस की साझेदारी का प्रतीक माना जाता है।
करीब तीन वर्षों के विकास कार्य के बाद 12 जून 2001 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित परीक्षण रेंज से ब्रह्मोस का पहला सफल परीक्षण किया गया। यह परीक्षण भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि इसके साथ ही देश ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल तकनीक वाले चुनिंदा देशों की श्रेणी में जगह बना ली। इसके बाद लगातार परीक्षण हुए और मिसाइल को विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म के अनुरूप विकसित किया गया।
ब्रह्मोस दो चरणों वाली मिसाइल है। पहले चरण में ठोस ईंधन वाला बूस्टर मिसाइल को सुपरसोनिक गति तक पहुंचाता है। इसके बाद दूसरा चरण सक्रिय होता है, जिसमें तरल ईंधन आधारित रैमजेट इंजन मिसाइल को और अधिक गति देता है।
यही तकनीक इसे अन्य क्रूज मिसाइलों की तुलना में कहीं अधिक तेज बनाती है। यह 'फायर एंड फॉरगेट' सिद्धांत पर काम करती है। यानी एक बार मिसाइल दाग दिए जाने के बाद उसे लगातार नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वयं अपने लक्ष्य तक पहुंचकर हमला करती है। इसके अलावा यह बहुत कम ऊंचाई पर उड़ सकती है, जिससे दुश्मन के रडार के लिए इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
नौसेना संस्करण : सबसे पहले 2005 में भारतीय नौसेना ने ब्रह्मोस को अपने बेड़े में शामिल किया। यह युद्धपोतों से दागी जा सकती है और समुद्र में दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम है। INS राजपूत पहला युद्धपोत था जिस पर इसे तैनात किया गया।
थलसेना संस्करण : 2007 में भारतीय सेना ने इसे अपने शस्त्रागार में शामिल किया। मोबाइल लॉन्चर से दागी जाने वाली यह मिसाइल सीमावर्ती क्षेत्रों में त्वरित कार्रवाई के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है। इसके ब्लॉक-I, ब्लॉक-II और ब्लॉक-III संस्करण विकसित किए गए हैं, जिनमें पहाड़ी क्षेत्रों में सटीक हमले की क्षमता भी शामिल है।
वायुसेना संस्करण : 2017 में सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से पहली बार इसका सफल परीक्षण किया गया। इसके बाद भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ। हवा से दागी गई ब्रह्मोस दुश्मन के ठिकानों पर लंबी दूरी से हमला कर सकती है।
पनडुब्बी संस्करण : मार्च 2013 में विशाखापत्तनम के तट पर पानी के भीतर से ब्रह्मोस का सफल परीक्षण किया गया। यह क्षमता भारत को समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अतिरिक्त बढ़त प्रदान करती है।
शुरुआती दौर में ब्रह्मोस की मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर थी। उस समय मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण इसकी सीमा सीमित रखी गई थी।
लेकिन भारत के MTCR का सदस्य बनने के बाद इसके उन्नत संस्करण विकसित किए गए। अब ब्रह्मोस के नए संस्करण 800 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य को भेदने में सक्षम हैं। भविष्य में इसकी रेंज को और बढ़ाने की दिशा में भी काम जारी है।
ब्रह्मोस का पहला परीक्षण 2001 में हुआ था, लेकिन लंबे समय तक इसका उपयोग केवल सैन्य अभ्यास और परीक्षणों तक सीमित रहा। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए। इन हमलों में ब्रह्मोस सहित HAMMER और SCALP जैसी आधुनिक हथियार प्रणालियों का उपयोग किए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद ब्रह्मोस की क्षमताओं पर फिर से चर्चा शुरू हो गई।
उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के तहत लखनऊ में ब्रह्मोस एयरोस्पेस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी स्थापित की गई है। यह केंद्र भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। यहां मिसाइलों का इंटीग्रेशन, परीक्षण और विभिन्न तकनीकी प्रक्रियाएं की जा रही हैं। इससे न सिर्फ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। इसके अलावा हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक्स और एवियोनिक्स से जुड़े कार्य होते हैं। नागपुर में एयरो-स्ट्रक्चर और मिसाइल घटकों का निर्माण किया जाता है। केरल के तिरुवनंतपुरम में प्रणोदन तकनीक से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य होते हैं। ओडिशा परीक्षण गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है, जबकि लखनऊ अब इंटीग्रेशन और निर्माण गतिविधियों का नया केंद्र बन चुका है।
ब्रह्मोस आज भारत की सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। इसकी सुपरसोनिक गति, सटीकता, चारों प्लेटफॉर्म से लॉन्च होने की क्षमता और दुश्मन के रडार को चकमा देने वाली तकनीक इसे दुनिया की सबसे प्रभावी क्रूज मिसाइलों में शामिल करती है।
यही वजह है कि जब भी भारत की रक्षा क्षमता की बात होती है, तो ब्रह्मोस का नाम सबसे पहले लिया जाता है। रूस के साथ शुरू हुई यह परियोजना अब भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति का मजबूत आधार बन चुकी है और लखनऊ जैसे शहरों तक पहुंचकर देश के रक्षा उत्पादन के नए अध्याय भी लिख रही है।