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Cancer News: कैंसर की जानलेवा थकावट ‘कैशेक्सिया’ के खिलाफ मिली बड़ी कामयाबी, जल्द आ सकती है दवा

Cancer muscle loss recovery: कैंसर के इलाज और इसके कारण होने वाली अत्यधिक थकावट (कैशेक्सिया) को रोकने में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। GDF15 प्रोटीन को टारगेट करने वाली नई दवा से मरीजों की भूख लौटने और मांसपेशियां मजबूत रहने की उम्मीद जागी है।
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Jul 22, 2026
Cancer Treatment News,
वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज के लिए नई रिसर्च की है। ( विजुअल डिजाइन: Google Gemini AI.)

Cancer Cachexia: कैंसर से जंग लड़ रहे मरीजों के लिए एक बहुत ही राहत भरी और उम्मीद जगाने वाली खबर आई है। कैंसर के दौरान शरीर को धीरे-धीरे सुखा देने वाली, मांसपेशियों को गला देने वाली और भयानक कमजोरी लाने वाली बीमारी 'कैशेक्सिया' के खिलाफ लड़ाई में वैज्ञानिकों को एक नई रोशनी दिखाई दी है। अब तक डॉक्टर और वैज्ञानिक यही समझते थे कि कैंसर के मरीजों में दिखने वाली थकावट और वजन का कम होना सिर्फ कैंसर या उसकी दवाइयों मसलन कीमोथेरेपी का असर है, लेकिन अब रिसर्च में यह बात साफ हो चुकी है कि यह अपने आप में एक अलग और बहुत ही खतरनाक स्थिति है। दुनिया भर के वैज्ञानिक अब इस बीमारी के काम करने के तरीके को समझ चुके हैं और जल्द ही इसकी दवाइयां बाजार में आने की उम्मीद है।

कैंसर के दौरान मरीज को होने वाली कमजोरी पर रिसर्च। ( विजुअल डिजाइन: ChatGPT)

क्या है यह कैशेक्सिया और यह इतना खतरनाक क्यों है?

अगर आसान शब्दों में समझें, तो कैंसर जब शरीर में फैलता है, तो वह केवल ट्यूमर (रसोली) तक सीमित नहीं रहता। वह शरीर के पूरे मेटाबॉलिज्म और ऊर्जा बनाने की प्रणाली को बिगाड़ देता है। कैशेक्सिया से पीड़ित इंसान को भूख लगना बिल्कुल बंद हो जाती है। बॉडी की मसल्स और फैट अपने आप पिघलने लगती हैं। मरीज इतना कमजोर हो जाता है कि उसका उठना-बैठना भी किसी बहुत बड़े पहाड़ को चढ़ने जैसा महसूस होता है।

कैंसर से 20 से 30 प्रतिशत मौतें कैशेक्सिया से अत्यधिक कमजोरी के कारण

आप इसे इस बात से समझ सकते हैं कि कई मरीज कैंसर की वजह से नहीं, बल्कि इस कैशेक्सिया की वजह से दम तोड़ देते हैं। आंकड़ों की मानें तो कैंसर से होने वाली कुल मौतों में से लगभग 20 से 30 प्रतिशत मौतें कैंसर के ट्यूमर से नहीं, बल्कि कैशेक्सिया से होने वाली अत्यधिक कमजोरी के कारण होती हैं। कैंसर के अलग-अलग प्रकारों और स्टेज के हिसाब से, लगभग 50 से 80 प्रतिशत मरीज अपने जीवन में कभी न कभी इस स्थिति का सामना जरूर करते हैं।

एक परिवार का दर्द: डेव कोचांज़िक की कहानी

इस बीमारी की गंभीरता को समझने के लिए अमेरिका के इंडियाना राज्य में रहने वाले डेव कोचांज़िक का उदाहरण लिया जा सकता है। डेव को एक खुशमिजाज और बेहद सक्रिय इंसान माना जाता था। वे पेशे से एक इलेक्ट्रिकल कांट्रैक्टर थे, समाज सेवा के लिए वॉलिंटियर फायरफाइटरका काम करते थे और अपने बड़े से फार्महाउस का पूरा ख्याल रखते थे। उन्हें तरह-तरह की डिशेज बनाने, बार्बेक्यू करने और अपने बगीचे की ताजा सब्जियां पकाने का बहुत शौक था। पूरे परिवार का एक साथ बैठ कर खाना खाना उनके घर का नियम था, लेकिन साल 2010 में जब उन्हें पैन्क्रियाटिक कैंसर के बारे में पता चला, तो अचानक उनकी पूरी जिंदगी बदल गई।

भूख धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो गई

उनका अगले सात सालों तक इलाज चला। भोजन के प्रति उनका प्यार तो वैसा ही रहा, लेकिन उनकी भूख धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो गई। उनकी मजबूत मांसपेशियां ढह गईं और वे बिल्कुल पतले और कमजोर हो गए। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि जो इंसान कभी पूरे फार्म का रखरखाव करता था, वह अपने घर के चूल्हे के लिए लकड़ी का एक टुकड़ा तक नहीं काट पाता था। उनके बेटे मार्टिन कोचांज़िक बताते हैं कि 'पिताजी को इस तरह घटते और सूखते देखना बहुत ही दर्दनाक था।'

कैंसर में होने वाली यह थकावट कोई मामूली बात नहीं है

डेव की साल 2017 में मौत हो गई। उनके जाने के बाद, उनके बेटे मार्टिन ने कैंसर कैशेक्सिया सोसाइटी के साथ मिलकर इस बीमारी के प्रति दुनिया भर में जागरूकता फैलाने का बीड़ा उठाया। मार्टिन आज जगह-जगह जा कर लोगों और डॉक्टरों को समझाते हैं कि कैंसर में होने वाली यह थकावट कोई मामूली बात नहीं है, यह कैशेक्सिया है।

'हजार पाउंड के कंबल के नीचे लेटने जैसा महसूस होना'

वाशिंगटन डीसी की एक मशहूर सोशियोलॉजिस्ट और शोधकर्ता एबिगेल न्यूवेल कहती हैं कि मरीजों ने उन्हें अपने अनुभव के बारे में जो बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला तथ्य है। मरीज कहते हैं कि कैशेक्सिया होने पर ऐसा लगता है मानो आपके ऊपर 'हजार पाउंड (सैकड़ों किलो) का भारी कंबल' डाल दिया गया हो और आप उसके नीचे दबे पड़े हों। ऐसे में सिर्फ एक जगह पर बैठना भी ऐसा लगता है मानो आपने कोई मैराथन दौड़ पूरी की हो। यह स्थिति मरीज के मन और दिमाग पर भी बहुत बुरा असर डालती है।

इलाज छोड़ने का मन करना

लगातार बनी रहने वाली थकावट और निराशा के कारण मरीज का हिम्मत टूटने लगता है। उसे लगता है कि अब दवाइयां लेने का कोई फायदा नहीं है। जब शरीर में मांसपेशियां ही नहीं बचतीं, तो मरीज भारी-भरकम कीमोथेरेपी या रेडिएशन के झटकों को सहन नहीं कर पाता। कई बार नई दवाओं के ट्रायल्स से मरीजों को सिर्फ इसलिए बाहर कर दिया जाता है, क्योंकि उनका शरीर बहुत ज्यादा कमजोर हो चुका होता है।

जब दुनिया के वैज्ञानिकों ने मिलाया हाथ: 'कैनकैन' प्रोजेक्ट

लंबे समय तक डॉक्टर यही सोचते रहे कि अगर हम कैंसर के ट्यूमर को मार देंगे, तो यह कमजोरी अपने आप ठीक हो जाएगी। लेकिन असल में ऐसा नहीं हुआ। जबरदस्ती खाना खिलाने या ड्रिप (ट्यूब) के माध्यम से पोषण देने से भी मरीज का वजन नहीं बढ़ता था। इस सोच को बदलने के लिए साल 2020 में एक बहुत बड़ा कदम उठाया गया। कैंसर ग्रैंड चैलेंजेज नाम की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों से इस बीमारी पर काम करने के लिए प्रस्ताव मांगे। इसके तहत 14 अलग-अलग संस्थानों के 16 बड़े रिसर्च ग्रुप्स को मिलाकर एक स्पेशल अंतरराष्ट्रीय टीम बनाई गई। इस परियोजना को नाम दिया गया कैनकैन।

वैज्ञानिकों ने 30 से भी ज्यादा बड़े रिसर्च पेपर्स छापे हैं

कैनकैन परियोजना की इस टीम को रिसर्च के लिए 20 मिलियन पाउंड (लगभग 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का फंड दिया गया। आज इस प्रोजेक्ट को शुरू हुए पांच साल हो चुके हैं। इस दौरान वैज्ञानिकों ने 30 से भी ज्यादा बड़े रिसर्च पेपर्स छापे हैं। इन रिसर्च ने कैशेक्सिया को देखने का पूरा नजरिया ही बदल दिया है।

कैंसर के मरीज को थकान पर रिसर्च में कामयाबी।(विजुअल डिजाइन: ChatGPT)

शरीर के अलग-अलग हिस्से कैसे मिलकर तबाही मचाते हैं?

हालिया शोधों से पता चला है कि कैशेक्सिया सिर्फ एक अंग या किसी एक जीन की बीमारी नहीं है। यह पूरा नेटवर्क है, जिसमें शरीर के कई अंग आपस में गलत सिग्नल (संकेत) भेजकर एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाते हैं।

  1. हड्डियों और मांसपेशियों पर हमला

कोलोराडो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंड्रिया बोनेटो पिछले 24 बरसों से इस विषय पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी रिसर्च में पाया कि जो ट्यूमर हड्डियों में नहीं होते (जैसे ओवरी या पेट का कैंसर), वे भी हड्डियों तक जहरीले संदेश भेजते हैं। इससे हड्डियां अंदर ही अंदर टूटने लगती हैं और मांसपेशियां गलने लगती हैं। हालांकि, जब वैज्ञानिकों ने चूहों पर ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों की कमजोरी) में दी जाने वाली बिस्फोस्फोनेट दवाओं का इस्तेमाल किया, तो पाया कि इससे हड्डियों और मांसपेशियों का नुकसान काफी हद तक रुक गया।

  1. लीवर (जिगर) की गड़बड़ी

हेल्महोल्ट्ज़ सेंटर (जर्मनी) के वैज्ञानिक मॉरीशियो बेरियल डियाज़ के अनुसार, लीवर हमारे शरीर का मुख्य मेटाबॉलिक इंजन है। कैशेक्सिया के दौरान कैंसर कोशिकाएं लीवर को ऐसे भ्रामक संकेत भेजती हैं कि वह खास तरह के केमिकल छोड़ने लगता है। ये केमिकल खून में मिलकर दिल की कोशिकाओं को सिकोड़ देते हैं और शरीर में जमा अच्छी चर्बी (फैट) को जबरदस्ती जलाने लगते हैं।

  1. वेगस नर्व की भूमिका

वैज्ञानिकों ने पाया कि दिमाग से निकलकर पेट और लीवर तक जाने वाली मुख्य नस, जिसे वेगस नर्व कहते हैं, कैशेक्सिया के दौरान खराब सिग्नल देने लगती है। जब चूहों में इस नस के गलत सिग्नलों को ब्लॉक (बंद) किया गया, तो चूहों का वजन गिरना बंद हो गया, उनकी भूख वापस आ गई और वे पहले से ज्यादा एक्टिव (सक्रिय) हो गए।

दिमाग, प्रोटीन और 'जीडीएफ15': भूख गायब होने का असली विलेन

सेंट लुइस के वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के न्यूरोवैज्ञानिक एडम केपेक्स कहते हैं कि कैशेक्सिया का असली कंट्रोल रूम हमारा दिमाग (ब्रेन) ही है। दिमाग ही शरीर के सभी अंगों से आने वाले सूजन और हार्मोन के संकेतों को इकट्ठा करता है। इस रिसर्च में सबसे बड़ी सफलता जीडीएफ15 (GDF15) नाम के एक प्रोटीन की पहचान करना रही है। जीडीएफ15 क्या करता है? सामान्य दिनों में यह प्रोटीन हमारे दिमाग को तब अलर्ट करता है जब हम कोई खराब या जहरीली चीज खा लेते हैं। यह तुरंत भूख मारकर हमें उल्टी या मिचली का अहसास कराता है।

कैंसर में आखिर होता क्या है?

ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी के कैंसर वैज्ञानिक मिन ली ने खोजा कि कैंसर के ट्यूमर खुद तो थोड़ा-बहुत जीडीएफ15 बनाते ही हैं, लेकिन वे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) की कोशिकाओं को भी बहका कर भारी मात्रा में जीडीएफ15 बनवाने लगते हैं।

कैंसर रोग में 'कैशेक्सिया' के असर पर रिसर्च।( विजुअल डिजाइन : Google Gemini AI.)

जीडीएफ15 क्या है और यह कैसे काम करता है ?

साइंस के अनुसार जब हमारा शरीर बिल्कुल स्वस्थ होता है, तब खून में जीडीएफ15 का स्तर बहुत कम होता है। जब शरीर में कोई बीमारी, इंफेक्शन, सूजन (Inflammation), या तनाव आता है—जैसे कि कैंसर, दिल की बीमारी या पेट की खराबी—तो शरीर की कोशिकाएं (Cells) बहुत ज्यादा मात्रा में जीडीएफ15 बनाना शुरू कर देती हैं। जीडीएफ15 का सबसे बड़ा असर हमारे दिमाग पर पड़ता है। जब यह प्रोटीन दिमाग के खास हिस्से में पहुंचता है, तो यह दिमाग को संकेत देता है कि "अभी शरीर ठीक नहीं है, खाना मत खाओ।" इससे इंसान की भूख पूरी तरह खत्म हो जाती है और मिचली (जी मिचलाना) जैसा महसूस होने लगता है। शरीर ऐसा इसलिए करता है ताकि बीमारी के दौरान पाचन में ऊर्जा बर्बाद न हो और शरीर अपनी बची हुई ताकत को बीमारी से लड़ने में लगा सके। जैसे जब हम बीमार होते हैं, तो खाना खाने का मन नहीं करता।

कैंसर जैसी बीमारियों में जीडीएफ15 हानिकारक क्यों बन जाता है?

मेडिकल साइंस के मुताबिक कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में यह 'अलार्म सिस्टम' खुद एक समस्या बन जाता है। कैंसर के ट्यूमर और शरीर का इम्यून सिस्टम बहुत अधिक मात्रा में जीडीएफ15 बनाने लगते हैं। इसके कारण मरीज को महीनों तक भूख नहीं लगती, जिससे वजन तेजी से गिरने लगता है, मांसपेशियां (मसल्स) गलने लगती हैं और शरीर में भयानक कमजोरी आ जाती है। इस स्थिति को डॉक्टर कैशेक्सिया कहते हैं। जीडीएफ15 शरीर का एक ऐसा प्रोटीन है जो बीमारी या तनाव के समय दिमाग को भूख मारने का सिग्नल देता है। आजकल वैज्ञानिक ऐसी दवाइयां बना रहे हैं जो इस प्रोटीन को रोक सकें, ताकि कैंसर और अन्य गंभीर मरीजों की भूख और वजन वापस लौट सके।

विशियस साइकिल प्रोटीन का रोल

रिसर्च के मुताबिक जब विशियस साइकिल प्रोटीन दिमाग तक पहुंचता है, तो दिमाग ट्यूमर को और सिग्नल भेजता है। इससे और ज्यादा इम्यून सेल्स जमा होते हैं और जीडीएफ15 का उत्पादन बढ़ता चला जाता है। नतीजतन, मरीज की भूख पूरी तरह खत्म हो जाती है। वैज्ञानिकों ने जब लैब में इस जीडीएफ15 प्रोटीन के असर को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया, तो चूहों में कैशेक्सिया के लक्षण गायब होने लगे।

बीमारी सिर्फ शारीरिक नहीं, 'इच्छाशक्ति' भी खत्म कर देती है

न्यूरोवैज्ञानिक एडम केपेक्स और उनकी टीम ने चूहों पर कुछ दिमागी और व्यवहार संबंधी टेस्ट किए। इसमें एक चौंकाने वाली बात सामने आई। कैशेक्सिया से पीड़ित चूहे सिर्फ भूखे या थके हुए ही नहीं थे, बल्कि उनके अंदर से मोटिवेशन (प्रेरणा या इच्छाशक्ति) पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।

बीमारी इंसान के दिमाग के उस हिस्से पर वार करती है जो उसे जीने और प्रयास करने की प्रेरणा देता है

आम तौर पर, भूखा जानवर भोजन पाने के लिए थोड़ा संघर्ष या मेहनत करता है। लेकिन कैशेक्सिया से पीड़ित चूहे भोजन या पानी सामने होने के बावजूद थोड़ा सा प्रयास करने के लिए भी तैयार नहीं थे। यानि, यह बीमारी इंसान के दिमाग के उस हिस्से पर वार करती है जो उसे जीने और प्रयास करने की प्रेरणा देता है।

उम्मीद की नई किरण: 'पोनसेग्रोमैब' और अन्य दवाइयां

इस समय कैशेक्सिया के इलाज को लेकर पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और बड़ी दवा कंपनियों में बहुत उत्साह है। विश्व प्रसिद्ध दवा कंपनी फाइजर (Pfizer) ने एक नई एंटीबॉडी दवा तैयार की है, जिसका नाम पोनसेग्रोमैब (Ponsegromab) है। यह यह दवा सीधे जाकर उसी विलेन प्रोटीन (जीडीएफ15) को निशाना बनाती है और उसे दिमाग तक संदेश भेजने से रोक देती है।

ताजा रिसर्च के नतीजे

रिसर्च के अनुसार 12 हफ्तों तक चले एक क्लीनिकल परीक्षण के दौरान देखा गया कि जिन कैंसर मरीजों को पोनसेग्रोमैब की खुराक दी गई, ,वे न केवल अपनी भूख वापस पाने में कामयाब रहे, बल्कि उनका वजन भी बढ़ा और उनकी मांसपेशियां वापस मजबूत होने लगीं। हालांकि, जापान जैसे देश में एनामोरेलिन (Anamorelin) नाम की दवा भूख बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है, लेकिन अमेरिकी संस्था एफडीए (FDA) और यूरोपीय एजेंसियों ने इसे पूरी तरह हरी झंडी नहीं दी थी क्योंकि इसके सुबूत नाकाफी थे। लेकिन पोनसेग्रोमैब जैसी नई दवाओं के नतीजों ने एक बार फिर पूरी दुनिया में उम्मीदें जगा दी हैं।

रिसर्च का रिजल्ट: एक बेहतर भविष्य की ओर

अब तक कैंसर के मरीज और उनके परिजन यही सोचते थे कि वजन का गिरना और हड्डियों का दिखना कैंसर की नियति है और इसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन कैनकेन प्रोजेक्ट और दुनिया भर के वैज्ञानिकों की मेहनत ने यह साबित कर दिया है कि कैशेक्सिया का इलाज संभव है।

बहरहाल, आने वाले कुछ सालों में अगर जीडीएफ15 को ब्लॉक करने वाली दवाइयां और ऑस्टियोपोरोसिस की दवाइयां आम मरीजों तक पहुंच जाती हैं, तो कैंसर रोगियों को न केवल एक लंबा जीवन मिलेगा, बल्कि वे अपनी जंग बिना दर्द, बिना भयानक कमजोरी और पूरे आत्म-विश्वास के साथ लड़ सकेंगे।

एक्सपर्ट कमेंट: जल्द ही इसका इलाज करने में कामयाबी मिलेगी

'पहले यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा रहस्य था। लेकिन पिछले कुछ सालों में जितनी तेजी से काम हुआ है, उससे मुझे पूरा यकीन है कि हम जल्द ही कैशेक्सिया को रोकने और इसका इलाज करने में कामयाब हो जाएंगे।'
-रयान शोएनफेल्ड, सीईओ,मार्क फाउंडेशन फॉर कैंसर रिसर्च।

Updated on:
22 Jul 2026 01:12 pm
Published on:
22 Jul 2026 01:12 pm