
India Energy Crisis Oil Import Bill: भारत को चलाने के लिए चाहे सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां हों, खेतों में चलते ट्रैक्टर हों, या फैक्ट्रियों में घूमते पहिये, जिस ईंधन (पेट्रोल, डीजल, गैस) की आवश्यकता होती है, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हम विदेश से खरीदते हैं। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की ओर से विदेशों से कच्चा तेल खरीदने पर किया जाने वाला कुल खर्च यानि तेल आयात बिल पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत तक बढ़ गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि भारत ने तेल की कुल मात्रा (Volume) में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की है, बल्कि आयात में मामूली गिरावट दर्ज की गई थी। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने भारत के सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ डाल दिया है। इससे आम घरेलू बजट भी बढ़ गया है । आइए इसकी गणित समझते हैं।
इस विजुअल से जानिए कि भारत विदेशी ईंधन पर किस हद तक निर्भर है। ( फोटो : ChatGPT.)
अमेरिकी वायुसेना ने ईरान के हवाई रक्षा तंत्र, तटीय निगरानी ठिकानों और मिसाइल डिपो को निशाना बनाकर कई दिनों तक हमले किए। इस कार्रवाई ने मध्य पूर्व (Middle East) में युद्ध जैसी अनिश्चितता पैदा कर दी। इस पूरे टकराव का सबसे संवेदनशील केंद्र है-होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)। यह फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच का एक बेहद संकरा समुद्री मार्ग है। दुनिया भर में व्यापार होने वाले कुल तेल का 20% (हर 5 में से 1 बैरल) इसी रास्ते से गुजरता है। भारत के लिए यह रास्ता किसी 'लाइफलाइन' से कम नहीं है, क्योंकि हमारे कुल तेल आयात का 40%, LNG का 60% और LPG का 90% इसी जलमार्ग से होकर भारत आता है।
संकट तब और गंभीर हो गया जब यमन के हौथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकाबंदी का ऐलान कर दिया। ओमान के तट पर दो तेल टैंकरों पर गोलाबारी की खबरें आईं। खतरे को देखते हुए जहाज मालिकों ने इस रास्ते का इस्तेमाल बंद कर दिया, जिससे होर्मुज मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या अचानक 8 से गिरकर महज 4 पर आ गई।
तेल को लेकर भारत हॉर्मुज पर किस हद तक निर्भर है, जानिए। ( फोटो : ChatGPT.)
जब समुद्री रास्तों पर गोले बारूद चलने लगते हैं, तो जहाजों का इंश्योरेंस (समुद्री बीमा) कराने का खर्च कई गुना बढ़ जाता है। साथ ही, जहाज मालिक अपने चालक दल (Crew) को इस खतरनाक रास्ते से गुजरने के लिए भारी जोखिम भत्ता (Risk Bonus) देते हैं। यह सारा अतिरिक्त खर्च अंततः कच्चे तेल की प्रति बैरल कीमत में जुड़ जाता है।
यूक्रेन ने रूस की तेल रिफाइनरियों पर सटीक ड्रोन हमले किए, जिससे रूस की रिफाइनिंग क्षमता काफी प्रभावित हुई। वर्षों तक दुनिया को भारी मात्रा में ईंधन निर्यात करने वाला रूस अब खुद गैसोलीन (पेट्रोल) आयात करने पर मजबूर हो गया है, जिससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति और सिकुड़ गई है।
तेल आयात से भारत पर प्रभाव। फोटो: ( फोटो : ChatGPT.)
चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की खरीद डॉलर में होती है, इसलिए तेल बिल बढ़ने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटता है। देश से बाहर जाने वाला पैसा देश में आने वाले पैसे से अधिक हो जाता है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ता है।
डॉलर की मांग अत्यधिक बढ़ने से भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होने लगता है। रुपया कमजोर होने से भारत द्वारा बाहर से मंगाया जाने वाला अन्य सारा सामान (इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल, उर्वरक, दवाइयां) भी खुद-ब-खुद महंगा हो जाता है।
डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ते ही देश भर में माल ढुलाई (Freight Charges) महंगी हो जाती है। जब ट्रकों का भाड़ा बढ़ता है, तो मंडियों में आने वाले फल, सब्जियां, खाद्यान्न, दूध और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं।
भारत में रसोई गैस का बजट और स्रोतों पर आधारित अनुमानित आंकड़े। ( फोटो : ChatGPT.)
कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत की खुदरा महंगाई को करीब 0.5% बढ़ा देती है और देश के चालू खाते के घाटे (CAD) पर अरबों डॉलर का अतिरिक्त दबाव डालती है।
इस संकट का असर केवल भारत जैसे आयातक देशों पर ही नहीं पड़ रहा, बल्कि वैश्विक राजनीति के सबसे ताकतवर केंद्रों पर भी इसका सीधा असर दिख रहा है:
अमेरिका में गैसेलीन (पेट्रोल) की औसत कीमत $4 प्रति गैलन के पार पहुँच गई है। अमेरिका में यह समय गर्मियों की छुट्टियों (Peak Summer Driving Season) का होता है, जब ईंधन की खपत सबसे ज्यादा होती है। राजनीतिक अध्ययनों के मुताबिक, पेट्रोल की कीमत में हर 10 सेंट की बढ़ोतरी से अमेरिकी राष्ट्रपति की लोकप्रियता (Approval Rating) में 0.6% की गिरावट आती है। तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 37% पर आ गई है, जिससे आगामी मध्यावधि चुनावों में उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है।
अमेरिकी सीनेट में एक नया विधेयक पेश किया गया है, जिसमें प्रस्ताव है कि जो भी देश (भारत सहित 5 देश) रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदेंगे, उनके ऊपर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। इसका सीधा मकसद रूस को मिलने वाले तेल राजस्व को रोकना है, लेकिन यदि यह प्रस्ताव कानून बनता है तो भारत के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा-या तो भारत को रूस से मिलने वाला रियायती तेल छोड़ना पड़ेगा या फिर अमेरिका से व्यापारिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।
भले ही वैश्विक स्थितियां चिंताजनक हों, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने संकट से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को पहले से बेहतर किया है।
भारत की एनर्जी सिक्योरिटी और और ब्रेट क्रूट की कीमतें। ( फोटो : ChatGPT.)
विश्लेषकों ने यह चेतावनी भी दी है कि यदि होर्मुज और लाल सागर के समुद्री रास्तों पर नाकाबंदी लंबी खिंचती है, तो वैश्विक बाज़ार में तेल की कमी और कीमतों का अनियंत्रित होना तय है। जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक बाज़ार में अनिश्चितता बनी रहेगी। भारत के लिए यह संकट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि तेल स्रोतों का दायरा और बढ़ाना होगा। वहीं मध्य पूर्व के अलावा अन्य सुरक्षित क्षेत्रों से लंबी अवधि के अनुबंध करने होंगे। रणनीतिक भंडार मजबूत करने होंगे और देश के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को हमेशा भरा रखना होगा।
पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता घटाने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), फ्लेक्स-फ्यूल और ग्रीन हाइड्रोजन को राष्ट्रीय स्तर पर और तेजी से बढ़ावा देना होगा। कच्चे तेल का यह झटका भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। जब तक अंतरराष्ट्रीय तनाव कम नहीं होता, तब तक सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के सामने महंगाई को काबू में रखने और रुपये को संभालने की एक कठिन चुनौती बनी रहेगी।
'भारत की अल्पकालिक तेल आपूर्ति फिलहाल सुरक्षित बनी हुई है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने तेल आपूर्तिकर्ताओं में काफी विविधीकरण किया है। अब हम केवल मध्य पूर्व पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि रूसी, वेनेजुएला और अफ्रीकी क्रूड का बड़ा हिस्सा खरीद रहे हैं। इसलिए तात्कालिक रूप से तेल की किल्लत होना मुश्किल है।'
- सुमित रितोलिया, लीड रिसर्च एनालिस्ट, कैपलर,एनर्जी सेक्टर एनालिस्ट फर्म।