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अंतरिक्ष में खगोलीय घटनाओं से बना सोना, फिर यह धरती पर कैसे पहुंचा? जानिए इसकी उत्पत्ति और अस्तित्व की दिलचस्प कहानी

Phenomenon of gold formation: दुनिया भर में चमकदार आभूषण और इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल (Use of Gold) होने वाला सोना जमीन पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में बना है। सोने की उत्पत्ति (Origin of Gold) और इसके जमीन तक पहुंचने की घटना बेहद दुर्लभ है। आइए जानते हैं सोने की उत्पत्ति, इसके बनने की प्रक्रिया और अस्तित्व की कहानी…
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भारत

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Vinay Shakya

Jul 21, 2026

Gold Origin History

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Gemini)

Gold Origin History: भारत दुनिया भर में सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। शादी समारोह, त्यौहार एवं अन्य विशेष मौके पर सोने के आभूषण पहनना देश की पुरानी परंपरा रही है। दुनिया भर के बाजारों में चमक रहा सोना इलेक्ट्रॉनिक्स में भी इस्तेमाल हो रहा है। खास बात है कि जो सोना अपनी चमक से लोगों को आकर्षित करता है, वह पृथ्वी पर नहीं बना है। सोने की उत्पत्ति बेहद जटिल प्रक्रिया के बाद हुई है और इसका इतिहास अरबों वर्ष पुराना है। हर बार जब कोई दुल्हन आभूषण पहनती है अथवा कोई इंजीनियर सोने के तार से सर्किट बनाता है तो वह अनजाने में ब्रह्मांड के प्राचीन इतिहास की कहानी को छू लेता है।

कब और कैसे हुई सोने की उत्पत्ति?

चमक से लोगों को आकर्षित करने वाला सोना पृथ्वी पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में बना है। सोने की उत्पत्ति सूर्य के अस्तित्व से भी पहले हुई है। अमेरिका के हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स (CFA) के शोधकर्ताओं के अनुसार, सोने की उत्पत्ति सूर्य के अस्तित्व से पहले हुई है। सूर्य के अस्तित्व में आने के अरबों वर्ष पहले ब्रह्मांड की बेहद हिंसक और शक्तिशाली घटनाओं से सोने की उत्पत्ति हुई।

हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के शोधकर्ताओं के अनुसार, पृथ्वी पर मौजूद अधिकांश सोना, प्लैटिनम और यूरेनियम जैसे भारी तत्व न्यूट्रॉन तारों के विलय (Neutron Star Mergers) से उत्पन्न हुआ है। यह खोज ब्रह्मांड में भारी तत्वों की उत्पत्ति को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। सामान्य तारे अपने जीवनकाल में हाइड्रोजन से शुरू करके लोहे तक के तत्व ही बना पाते हैं।

लोहे से भारी तत्व बनाने के लिए सामान्य नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होती है। इसके लिए अत्यधिक ऊर्जा, तीव्र न्यूट्रॉन-समृद्ध वातावरण और बेहद कम समय में भारी मात्रा में न्यूट्रॉन कैप्चर की जरूरत पड़ती है। ऐसी स्थितियां केवल ब्रह्मांड की बेहद दुर्लभ घटनाओं में ही होती हैं। खासकर दो न्यूट्रॉन तारों के टकराने पर ऐसी स्थिति बनती है।

कैसे बनते हैं न्यूट्रॉन तारे?

जब कोई बहुत बड़ा तारा (सूर्य से भी बड़ा और भारी) अपने जीवन के अंत में ईंधन खत्म कर लेता है, तो वह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से ध्वस्त हो जाता है। इस विस्फोट को सुपरनोवा कहते हैं। सुपरनोवा के बाद बचा हुआ अत्यंत घना कोर न्यूट्रॉन तारा बन जाता है। एक न्यूट्रॉन तारा सूर्य जितनी सामग्री को मात्र 10-20 किलोमीटर के व्यास में समेटे रहता है। इनकी घनत्व इतना अधिक होती है कि 1 चम्मच सामग्री का वजन अरबों टन हो सकता है। कई बार दो न्यूट्रॉन तारे एक-दूसरे की परिक्रमा करते हुए करोड़ों वर्ष बिताते हैं।

गुरुत्वाकर्षण तरंगों के कारण उनकी कक्षा धीरे-धीरे सिकुड़ती जाती है। अंत में वे बेहद तेज गति से टकराते हैं। इस टक्कर के क्षण में तापमान अरबों डिग्री तक पहुंच जाता है और अत्यधिक न्यूट्रॉन-समृद्ध वातावरण तैयार हो जाता है। इसी वातावरण में आर-प्रोसेस (Rapid Neutron Capture Process) सक्रिय होता है। इस प्रक्रिया में न्यूट्रॉन तत्वों के नाभिक में इतनी तेजी से पकड़े जाते हैं कि परमाणु स्थिर होने से पहले ही भारी हो जाते हैं। पूरी प्रक्रिया एक सेकंड से भी कम समय में पूरी हो जाती है। इस जटिल प्रक्रिया के बाद सोना, प्लैटिनम, यूरेनियम, थोरियम और अन्य भारी तत्वों की भारी मात्रा पैदा हो जाती है।

पृथ्वी पर सोना कैसे पहुंचा?

वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्रह्मांड के प्रारंभिक चरण में कई ऐसे न्यूट्रॉन तारा विलय हुए। इन घटनाओं से बने भारी तत्व गैस और धूल के बादलों में मिल गए। बाद में जब सूर्य और उसके ग्रह बन रहे थे तो ये तत्व हमारे सौर मंडल में शामिल हो गए। पृथ्वी के निर्माण के दौरान ये भारी तत्व मुख्य रूप से कोर (Core) की ओर डूब गए, लेकिन बाद के उल्कापिंडों (Asteroids) के टकराव ने उन्हें पृथ्वी की सतह पर फिर से बिखेर दिया। यही कारण है कि आज हम सोने को खदानों से प्राप्त कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों की यह खोज सिर्फ सोने की कहानी नहीं है। यह पूरे ब्रह्मांड के रासायनिक विकास को समझने में मदद करती है। इससे पहले वैज्ञानिक सोचते थे कि भारी तत्व सुपरनोवा विस्फोटों से बनते हैं, लेकिन नए शोध बताते हैं कि सामान्य सुपरनोवा पर्याप्त न्यूट्रॉन-समृद्ध वातावरण नहीं बना पाते। न्यूट्रॉन तारा विलय ही मुख्य स्रोत है।

वैज्ञानिकों ने 2017 में की ऐतिहासिक खोज

सोना, प्लैटिनम, यूरेनियम, थोरियम और अन्य भारी तत्वों के अस्तित्व में आने के सिद्धांत को वैज्ञानिकों द्वारा 2017 में की गई ऐतिहासिक खोज महत्वपूर्ण साबित हुई। वर्ष 2017 में वैज्ञानिकों ने पहली बार न्यूट्रॉन तारा विलय की घटना का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। वैज्ञानिकों ने 'GW170817' नाम से इस घटना की गुरुत्वाकर्षण तरंगों को अमेरिका की लाइगो (LIGO) और इटली की विर्गो (Virgo) वेधशालाओं ने दर्ज किया। इसके कुछ सेकंड बाद दुनिया भर की दूरबीनों ने एक तेज चमकदार वस्तु को देखा, जिसे किलोनोवा (Kilonova) कहा गया।

CFA समेत अंतरराष्ट्रीय टीमों ने स्पेक्ट्रोस्कोपिक विश्लेषण और कंप्यूटर मॉडलिंग के जरिए बताया कि एक किलोनोवा में लगभग 200 पृथ्वी के बराबर द्रव्यमान का सोना बना होगा। इसके साथ ही भारी मात्रा में प्लैटिनम और अन्य भारी तत्व भी उत्पन्न हुए। यह घटना पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर आकाशगंगा 'NGC 4993' में हुई थी, लेकिन इससे मिले सबूतों ने भारी तत्वों की उत्पत्ति के रहस्य को काफी हद तक सुलझा दिया।

अंतरिक्ष के अन्य रहस्यों पर शोध कर रहे वैज्ञानिक

हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के शोधकर्ता अब और अधिक संवेदनशील उपकरणों से ऐसे और विलयों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। नई पीढ़ी की दूरबीनें और अंतरिक्ष-आधारित ऑब्जर्वेटरी इस रहस्य को और गहराई से उजागर करेंगी। इन अध्ययनों से न केवल ब्रह्मांड के इतिहास का पता चलेगा, बल्कि भविष्य में तत्वों के निर्माण और आकाशगंगाओं के विकास के मॉडल भी बेहतर होंगे। हार्वर्ड-स्मिथसोनियन का यह अध्ययन याद दिलाता है कि हमारा ग्रह और हम स्वयं ब्रह्मांड की उन हिंसक, लेकिन रचनात्मक घटनाओं के उपहार हैं।