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जब जनता का गुस्सा संसद के दरवाजे तक पहुंचा, भारत के उन आंदोलनों की कहानी जिन्होंने इतिहास बदला

Major Mass Movements In India : जब जनता का गुस्सा संसद के दरवाजे तक पहुंचा! 1966 के गौरक्षा आंदोलन से लेकर जेपी क्रांति, किसान आंदोलन और 2026 के जंतर-मंतर प्रदर्शन तक, जानिए भारत के उन ऐतिहासिक आंदोलनों की पूरी कहानी जिन्होंने देश का इतिहास, कानून और सत्ता बदल दी।
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Street to Parliament March

Street to Parliament March : कब-कब हुआ सड़क से सत्ता तक संघर्ष, PC- Patrika

Major Mass Movements In India : दिल्ली का जंतर-मंतर का स्थान और 20 जुलाई 2026 का दिन। 28 जून से सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक जंतर मंतर पर धरना दे रहे थे। सोनम वांगचुक को 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कर दिया। लेकिन, पहले से निर्धारित दिन 20 जुलाई को जंतर-मतर से संसद तक मार्च होनी तय थी। 19 जुलाई की शाम से ही देश के सभी प्रदेशों से छात्र आंदोलन में हिस्सा लेने पहुंच चुके थे। जंतर-मंतर पर हजारों छोत्रों की भीड़ थी।

प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी और कथित पेपर लीक के खिलाफ संसद की ओर बढ़े। पुलिस ने बैरिकेड लगाए, आंसू गैस के गोले दागे और मार्च को संसद तक पहुंचने से रोक दिया। यह कोई अकेली घटना नहीं है। आजादी के बाद से भारत में दर्जनों बार ऐसा हुआ है जब सड़क का गुस्सा संसद के दरवाज़े तक पहुंचा और कई बार उसने कानून और नीतियां तक बदल दीं। आइए जानते हैं देश में जब जन-आंदोलन ने सत्ता के गलियारों को हिलाया। किस मांग पर, कितना असर हुआ, और किसकी अधूरी रह गई।

सड़क से संसद तक कब पहुंचते हैं प्रदर्शनकारी

भारत में संसद तक मार्च सिर्फ एक जुलूस नहीं होता, यह जनता के आक्रोश का प्रतीक होता है। लोग तब सड़क पर उतरते हैं जब उन्हें लगता है कि उनकी बात दफ्तरों, अदालतों या चुनावी मंचों तक नहीं पहुंच रही। संसद देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था है, इसलिए आंदोलनकारी उसकी ओर बढ़कर अपनी मांग को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहते हैं। लेकिन हर आंदोलन का नतीजा एक जैसा नहीं होता, कुछ को पूरी जीत मिली, कुछ को आंशिक सफलता, और कुछ बैरिकेड पर ही दम तोड़ गए, भले ही उनका मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया हो।

गौहत्या-निषेध आंदोलन (1966)

आजादी के बाद संसद तक पहुंचे शुरुआती बड़े प्रदर्शनों में से एक 7 नवंबर 1966 को हुआ, जब सर्वदलीय गौरक्षा महाभियान समिति के नेतृत्व में देशभर के साधु-संतों और गौ-भक्तों ने गौहत्या पर प्रतिबंध की मांग को लेकर संसद भवन के बाहर प्रदर्शन किया। स्वामी करपात्री जी महाराज और कई शंकराचार्य इसमें शामिल हुए। भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया, एक सिपाही की मौत हो गई, और जवाब में पुलिस फायरिंग व लाठीचार्ज में कई प्रदर्शनकारी मारे गए।

उस समय गृह मंत्री गुलज़ारीलाल नंदा ने नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। मृतकों की सही संख्या को लेकर आज भी मतभेद है। तत्कालीन सरकारी बयान और उस दौर की अखबार रिपोर्टों (जैसे इंडियन एक्सप्रेस) में करीब 7-8 मौतें और 100-200 घायल होने का ज़िक्र मिलता है, जबकि कुछ हिंदुत्व-समर्थक स्रोतों में सैकड़ों से लेकर हज़ारों तक मौतों के दावे किए जाते हैं, जिन्हें फैक्ट-चेकर्स आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर अतिरंजित बताते हैं। बहरहाल, केंद्रीय स्तर पर गौहत्या-निषेध कानून तब भी नहीं बन सका और यह मुद्दा आज भी राज्यों के अलग-अलग कानूनों तक सीमित है।

जेपी आंदोलन और संपूर्ण क्रांति (1974-75)

18 मार्च 1974 को पटना में छात्रों के आक्रोश से शुरू हुआ आंदोलन जल्द ही राष्ट्रव्यापी बन गया। महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से त्रस्त जनता के गुस्से को जयप्रकाश नारायण ने आवाज दी। 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में जेपी ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया। आंदोलन इतना व्यापक हो गया कि 25 जून 1975 को जेपी ने राष्ट्रव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान करते हुए सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों से असहयोग की अपील कर दी। इसी रात इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर दिया। भले ही आंदोलन ने तुरंत कोई कानून नहीं बदलवाया, लेकिन इसका असर बहुत गहरा था। 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई और आजाद भारत में पहली बार गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी। यह सड़क से संसद तक के सबसे बड़े सत्ता-परिवर्तनों में गिना जाता है।

असम आंदोलन (1979-1985)

बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान और निष्कासन की मांग को लेकर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के नेतृत्व में छह साल तक चला यह आंदोलन देश के सबसे लंबे जन-आंदोलनों में से एक था। लगातार हड़तालें, बंद और प्रदर्शन हुए। आखिरकार 1985 में केंद्र सरकार, असम सरकार और आंदोलनकारियों के बीच असम समझौता हुआ, जिसमें विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए एक तय समयसीमा तय की गई। यह आंदोलन की बड़ी जीत मानी गई, हालांकि समझौते के प्रावधानों को लागू करने पर विवाद दशकों बाद भी जारी है जैसा NRC को लेकर हाल के वर्षों में देखा गया।

मंडल आयोग विरोधी आंदोलन (1990)

7-13 अगस्त 1990 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% आरक्षण देने की घोषणा की। इसके खिलाफ पूरे उत्तर भारत में हिंसक विरोध भड़क उठा। कॉलेज और यूनिवर्सिटी आंदोलन का केंद्र बन गए। 19 सितंबर 1990 को दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी के आत्मदाह प्रयास ने पूरे देश को झकझोर दिया। रिपोर्टों के मुताबिक इस दौर में 200 से ज़्यादा युवाओं ने आत्मदाह की कोशिश की, जिनमें से 62 की मौत हो गई। आंदोलन के बावजूद सरकार पीछे नहीं हटी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और 16 नवंबर 1992 को इंद्रा साहनी मामले में अदालत ने 27% आरक्षण को बरकरार रखा, साथ ही 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा तय की। यह आंदोलन विरोध के बावजूद नीति में बदलाव न कर पाने और अदालत के जरिए मध्यम रास्ता निकलने का उदाहरण है।

सूचना के अधिकार (RTI) आंदोलन (1990 का दशक)

हर बड़ा आंदोलन दिल्ली की सड़कों पर ही नहीं लड़ा गया। राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) के नेतृत्व में 1990 के दशक में शुरू हुआ यह आंदोलन गांव-गांव में मजदूरी और सरकारी खर्च के रिकॉर्ड की पारदर्शिता की मांग से उठा। बीसियों साल की मेहनत के बाद यह राष्ट्रीय आंदोलन बना और आखिरकार 2005 में केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) पारित किया। एक ऐसा कानून जिसने आम नागरिक को सरकारी फैसलों पर सवाल पूछने का हथियार दे दिया। यह जमीनी स्तर के आंदोलन के राष्ट्रीय कानून में तब्दील होने की मिसाल है।

अन्ना हजारे आंदोलन और लोकपाल की मांग (2011)

2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हुआ, जिसका केंद्र जंतर-मंतर और रामलीला मैदान बना। मांग थी- मजबूत जन लोकपाल कानून। यह मार्च और धरने का मिला-जुला आंदोलन था। संसद भवन पर स्थायी कब्जे का इरादा नहीं था, लेकिन दबाव संसद तक साफ पहुंचा और लोकपाल पर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई। नतीजतन लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम बना। इसे आंशिक सफलता कहा जाता है… कानून तो बना, लेकिन भ्रष्टाचार खत्म होने का दावा नहीं किया जा सकता। इसी आंदोलन से निकले कई चेहरे बाद में सक्रिय राजनीति में भी उतरे।

निर्भया आंदोलन (2012)

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद देशभर में उबाल आ गया। प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट और संसद क्षेत्र के आसपास तक पहुंचे, पुलिस ने कई जगह रोक लगाई और हालात तनावपूर्ण रहे। महिला सुरक्षा राष्ट्रीय मुद्दा बन गई। सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति गठित की, जिसकी सिफारिशों पर आपराधिक कानून में संशोधन कर बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े प्रावधानों को सख़्त किया गया। इसे कानूनी सफलता माना जाता है, हालांकि महिला सुरक्षा की चुनौती आज भी बनी हुई है।

भूमि अधिग्रहण कानून विरोधी आंदोलन (2015)

2013 के भूमि अधिग्रहण कानून (LARR एक्ट) में संशोधन के लिए मोदी सरकार दिसंबर 2014 में एक अध्यादेश लाई, जिसे विरोध बढ़ने पर अप्रैल और फिर 30 मई 2015 को दोबारा जारी करना पड़ा। संशोधन विधेयक 24 फरवरी 2015 को लोकसभा में पेश कर पास तो करा लिया गया, लेकिन किसान संगठनों और विपक्षी दलों के भारी विरोध के बीच सरकार को राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। संसद सत्र के दौरान यह मुद्दा लगातार उठा और सरकार पर किसान-विरोधी होने के आरोप लगे। सड़क और संसद दोनों जगह दबाव साथ बना, और आखिरकार सरकार ने अध्यादेश को आगे नहीं बढ़ाया। नतीजतन प्रस्तावित संशोधन कानून का रूप नहीं ले सके और मूल 2013 का कानून ही लागू रहा। यह दिखाता है कि हर जीत सिर्फ सड़क पर नहीं मिलती। संसद के भीतर संख्या-बल भी उतना ही मायने रखता है।

वन रैंक वन पेंशन (OROP) आंदोलन

पूर्व सैनिकों ने वन रैंक वन पेंशन (यानी समान रैंक और समान सेवा-अवधि वालों को रिटायरमेंट की तारीख चाहे जो हो, बराबर पेंशन) की मांग को लेकर लंबे समय तक जंतर-मंतर पर धरना दिया, और यह मुद्दा संसद सत्रों में भी बार-बार उठा। फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर OROP लागू करने का आदेश दिया। आखिरकार 7 नवंबर 2015 को सरकार ने इसकी औपचारिक अधिसूचना जारी की, जिसके तहत मिलने वाले लाभ 1 जुलाई 2014 से प्रभावी माने गए। यह आंदोलन की बड़ी उपलब्धि थी, हालांकि पेंशन की गणना, हर पांच साल में होने वाले पुनर्निर्धारण (पहला संशोधन 1 जुलाई 2019 को हुआ) और लागू करने के तरीकों पर विवाद बाद में भी बना रहा, इसलिए इसे आंशिक समाधान ही कहा जाता है।

एससी-एसटी एक्ट बचाओ आंदोलन (2018)

2018 में एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून से जुड़े एक अदालती फैसले के बाद देशभर में दलित और आदिवासी संगठनों ने भारत बंद बुलाया। संगठित सामाजिक दबाव का असर सीधे कानून पर दिखा। बजट सत्र 2018 के दौरान केंद्र सरकार संशोधन विधेयक लेकर आई, जिसमें कानून के पुराने प्रावधान बहाल किए गए, और संसद ने इसे पारित कर दिया। यह अपेक्षाकृत स्पष्ट परिणाम वाले आंदोलन का उदाहरण है।

नागरिकता संशोधन कानून विरोध और शाहीन बाग (2019-2020)

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ 2019-2020 में देशभर में प्रदर्शन हुए, जिसका सबसे चर्चित चेहरा दिल्ली का शाहीन बाग धरना बना। यहां प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च करने के बजाय लंबे समय तक धरने और प्रतीकात्मक विरोध पर टिके रहे। आंदोलन ने कानून को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ज़रूर ला दिया और संसद में विपक्ष ने मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया, लेकिन कानून वापस नहीं लिया गया। इसका असर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तो हुआ, पर तात्कालिक कानूनी जीत के रूप में नहीं।

किसान आंदोलन… सबसे बड़ी हालिया मिसाल (2020-2021)

संसद-मार्च और 'दिल्ली चलो' आंदोलनों में किसान आंदोलन को सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। 2020 में तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने दिल्ली कूच किया। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसान दिल्ली की सीमाओं पर जमा हुए, उन्हें शहर में घुसने से रोका गया, जगह-जगह बैरिकेडिंग हुई और पानी की बौछारों व आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ। किसान सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर करीब एक साल तक डटे रहे। मुख्य मांग थी- तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी दी जाए। नवंबर 2021 में सरकार ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की, और बाद में संसद ने इन्हें निरस्त कर दिया। यह आंदोलन की बड़ी जीत थी, लेकिन MSP की कानूनी गारंटी की मांग आज भी अधूरी है।

कॉकरोच जनता पार्टी का संसद मार्च (20 जुलाई 2026)

NEET-UG 2026 की परीक्षा में पेपर लीक और गड़बड़ियों को लेकर 6 जून 2026 से 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) नाम के संगठन ने आंदोलन शुरू किया, जो 20 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने में बदल गया। संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और कार्यकर्ता जंतर-मंतर पर बैठे हुए थे। आंदोलन के समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठ गए। सोनम वांगचुक और अन्य दलों के कार्यकर्ताओं ने 20 जुलाई को संसद मार्च रखा। क्योंकि 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू होना तय था।

लेकिन, इससे पहले ही सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस धरना स्थल से उठा ले गई और सफदरगंज अस्पताल में भर्ती करवा दिया। मार्च पहले से ही निर्धारित था, लेकिन…दिल्ली पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी। उच्च सुरक्षा क्षेत्र में धारा 163 के तहत पाबंदी आदेश लागू कर दिए। बैरिकेड, धक्का-मुक्की, लाठीचार्ज और आंसू गैस के बीच मार्च संसद तक नहीं पहुंच सका, हालांकि मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा में ज़रूर आ गया और सरकार के प्रतिनिधियों से बातचीत की कोशिशें शुरू हुईं। जब छात्रों ने संसद की ओर कूच किया तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में छात्र घायल हुए और प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी भी घायल हुए। पुलिस ने स्थिति को संभालने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े।

मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार और जवाबदेही तय करने के साथ-साथ वांगचुक की बिना शर्त रिहाई (उन्हें प्रदर्शन स्थल से हटाकर अस्पताल में रखा गया था) भी शामिल थी। मानसून सत्र के पहले दिन, 20 जुलाई 2026 को, CJP ने जंतर-मंतर से "संसद चलो" मार्च का आह्वान किया, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी और उच्च सुरक्षा क्षेत्र में धारा 163 के तहत पाबंदी आदेश लागू कर दिए। बैरिकेड, धक्का-मुक्की, लाठीचार्ज और आंसू गैस के बीच मार्च संसद तक नहीं पहुंच सका, हालांकि मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा में ज़रूर आ गया और सरकार के प्रतिनिधियों से बातचीत की कोशिशें शुरू हुईं। इस आंदोलन का अंतिम राजनीतिक नतीजा अभी तय नहीं है। कोई ठोस सरकारी घोषणा या कानूनी बदलाव फिलहाल सामने नहीं आया है, इसलिए इसे अधूरा परिणाम ही कहा जाएगा।

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