
भारत दुनिया के टॉप इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (Electronic Waste) उत्सर्जन देशों में तीसरे स्थान पर है। देश में सालाना करीब 1.41 मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste) होता है। इस ई-कचरे को उचित तरीके से रीसाइकिल किया जाए तो इसमें लगभग 350 टन शुद्ध सोना निकल सकता है, जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपए होगी। हालांकि, केवल 2 से 3 फीसदी ही ई-कचरा रीसाइकिल हो रहा है, बाकी का कचरा पर्यावरण को दूषित करता है। अनुमान के मुताबिक, देश में ई-कचरे की बर्बादी से करीब 6,347 करोड़ रुपए के सोने का नुकसान हो रहा है। ई-कचरा न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट भी पैदा कर रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट या ई-कचरा सभी पुरानी, खराब या बेकार इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस हैं, जो अब उपयोग में नहीं आते हैं। इसमें मोबाइल फोन, चार्जर, लैपटॉप, कंप्यूटर, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, प्रिंटर, बैटरी, केबल और यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक खिलौने शामिल हैं। ई-कचरे में सोना, चांदी, तांबा, एल्युमीनियम, प्लेटिनम, पैलेडियम जैसी कीमती धातुएं भरपूर मात्रा में होती हैं। इसके साथ ही लेड, मर्करी, कैडमियम जैसे जहरीले तत्व भी मौजूद रहते हैं।
यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम (UNEP) के अनुसार, ई-कचरा कीमती धातुओं का बड़ा भंडार है, जिसमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, रेयर अर्थ एलिमेंट्स (जैसे नियोडिमियम) भी शामिल हैं। प्राकृतिक अयस्कों की तुलना में ई-कचरे में इन धातुओं की सांद्रता कई गुना अधिक होती है।
एक टन पुराने मोबाइल फोन से 300-400 ग्राम सोना और 3000-4000 ग्राम चांदी निकल सकती है। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) से भी 200-300 ग्राम सोना मिल सकता है। यह पारंपरिक सोने की खदानों से 10 से 100 गुना अधिक है।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय एवं CPCB के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में भारत में 1.41 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ। चीन और अमेरिका के बाद भारत ई-कचरा पैदा करने वाला तीसरा देश है। साल 2020 से 2023 के बीच ई-कचरा लगातार बढ़ा, फिर थोड़ी कमी आई, लेकिन 2024-26 में फिर उछाल आया।
CPCB बिक्री डेटा और उपकरणों की औसत उम्र के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है। हाल के वर्षों में ई-कचरे के उत्सर्जन में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। साल 2020-21 में ई-कचरे के उत्सर्जन में 26.33% बढ़ोतरी हुई, 2025 तक यह आकड़ा 82% तक पहुंचा, फिर 10% की गिरावट। कुछ रिपोर्ट्स में कुल उत्पादन 1.25-1.4 मिलियन टन के आसपास बताया गया है, जबकि अनौपचारिक स्रोतों के अनुमान के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और अधिक हो सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक कचरा लगातार तेजी से बढ़ रहा है। तेजी से बढ़ते ई-कचरे की वजह से वैश्विक स्थर पर पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2024 के अनुसार, 2022 में दुनिया भर में 62 मिलियन टन ई-कचरा पैदा हुआ, जो 2010 से 82% अधिक है। 2030 तक यह 82 मिलियन टन पहुंचने की संभावना है। कुल मात्रा का महज 22.3% कचरा ही सही तरीके से इकट्ठा और रीसाइकिल हो पाया है। बचा हुआ कचरा जला दिया जाता है या धरती में दबा दिया जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक कचरे की अनौपचारिक रीसाइक्लिंग, जलाना या लैंडफिल में दबाने से लेड, मर्करी और कैडमियम जैसे जहरीले पदार्थ मिट्टी, पानी और हवा में घुल जाते हैं। इससे भूजल प्रदूषित होता है, फसलें प्रभावित होती हैं। इसके असर से जलीय जीव पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
इलेक्ट्रॉनिक कचरे को खुले में जलाने से डाइऑक्सिन जैसी विषैली गैसें निकलती हैं, जो सांस की बीमारियां, कैंसर और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा करती हैं। WHO के मुताबिक, अनौपचारिक सेक्टर में काम करने वाले लाखों बाल मजदूर और खासकर गर्भवती महिलाओं को ज्यादा जोखिम है। भारत में 90% ई-कचरा असंगठित क्षेत्र द्वारा हैंडल किया जाता है, जहां बिना सुरक्षा के काम होता है।
भारत और दुनिया भर के देशों में इलेक्ट्रॉनिक कचरे की रीसाइक्लिंग दर 10% से 43% तक बताई जाती है, लेकिन हालिया आंकड़ों में औपचारिक चैनल के जरिए 60-70% तक पहुंचने का दावा है। सामने आए आकड़ों से स्पष्ट है कि बहुत कम हिस्सा ही पर्यावरण-अनुकूल तरीके से प्रोसेस होता है।
दुनिया में यूरोपीय संघ E-कचरे की रीसाइक्लिंग में सबसे आगे है। यूरोपीय संघ 42-46% और जर्मनी 61% तक E-कचरे की रीसाइक्लिंग करता है। हालांकि, चीन भी तेजी से रीसाइक्लिंग की क्षमता बढ़ा रहा है। वहीं, जापान और दक्षिण कोरिया रीसाइक्लिंग में उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।
E-कचरे की रीसाइक्लिंग में भारत के लिए कई बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि, भारत भारत इस स्थिति से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठा रहा है। भारत सरकार ने 'विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी' (EPR) को मजबूत किया है, जिसमें उत्पादकों को अपने उत्पादों के अंतिम जीवन की जिम्मेदारी लेनी होती है।
दिल्ली में देश का पहला ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग पार्क बन रहा है, जो सालाना 51,000 टन प्रोसेस करने की क्षमता रखेगा। CPCB रजिस्टर्ड रिसाइक्लर्स बढ़ रहे हैं, लेकिन असंगठित क्षेत्र अभी भी हावी है। कुछ कंपनियां EPR नियमों को चुनौती दे रही हैं, क्योंकि लक्ष्य (80% तक) मुश्किल लगते हैं और लागत बढ़ती है।