
Leela Row Dayal Wimbledon : लंदन का ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस एंड क्रोकेट क्लब। जुलाई का महीना। सेंटर कोर्ट पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ टेनिस खिलाड़ी उतरते हैं और दर्शक दीर्घा में बैठी हस्तियां उस रोमांच की गवाह बनती हैं, जिसे खेल जगत का सबसे प्रतिष्ठित आयोजन माना जाता है। हर साल की तरह इस बार भी विंबलडन ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। भारतीय क्रिकेट टीम के कई मौजूदा और पूर्व खिलाड़ी भी यहां मुकाबलों का आनंद लेते दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें वायरल हुईं और क्रिकेट तथा टेनिस के इस संगम की खूब चर्चा हुई।
लेकिन, इसी विंबलडन की चमक-दमक के बीच भारतीय खेल इतिहास का एक ऐसा अध्याय भी है, जो समय की धूल में कहीं दब सा गया। यह कहानी है उस भारतीय महिला की, जिसने तब विंबलडन के कोर्ट पर जीत हासिल की थी, जब भारत अभी गुलाम था, महिलाओं के लिए खेलों में भाग लेना भी आसान नहीं था और दुनिया भारतीय खिलाड़ियों को गंभीरता से नहीं लेती थी।
यह कहानी है लीला रो दयाल की। उस खिलाड़ी की, जिसने 1934 में विंबलडन महिला एकल मुकाबले में जीत दर्ज कर भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया।
19 दिसंबर 1911 को मुंबई में जन्मीं लीला रो दयाल केवल एक टेनिस खिलाड़ी नहीं थीं। वे एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी महिला थीं, जिनकी रुचि खेल, साहित्य, कला और संस्कृति तक फैली हुई थी।
वे भारतीय शास्त्रीय नृत्य की गहरी जानकार थीं, लेखन में रुचि रखती थीं और पर्वतारोहण जैसी गतिविधियों में भी दिलचस्पी लेती थीं। उनका व्यक्तित्व उस दौर की भारतीय महिलाओं की पारंपरिक छवि से काफी अलग था। वे उन महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने अपने समय से आगे बढ़कर सोचने और जीने का साहस दिखाया।
लीला रो दयाल की सफलता की कहानी उनकी मां पंडिता क्षमा राव का जिक्र किए बिना पूरी नहीं हो सकती। पंडिता क्षमा राव अपने समय की प्रसिद्ध संस्कृत विदुषी, लेखिका और टेनिस खिलाड़ी थीं। जब भारत में महिलाओं के लिए खेलों में भाग लेना भी असामान्य माना जाता था, तब क्षमा राव खेल के मैदान में अपनी पहचान बना चुकी थीं।
उन्होंने 1927 में प्रतिष्ठित बॉम्बे प्रेसिडेंसी हार्ड कोर्ट चैंपियनशिप का महिला एकल खिताब जीता था। उस समय यह उपलब्धि किसी बड़ी राष्ट्रीय सफलता से कम नहीं मानी जाती थी। वे भारत की शुरुआती महिला टेनिस चैंपियनों में गिनी जाती हैं।
क्षमा राव का मानना था कि शिक्षा और खेल दोनों जीवन के लिए समान रूप से आवश्यक हैं। उन्होंने अपनी बेटी को केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे खेल और शारीरिक गतिविधियों के लिए भी प्रोत्साहित किया।
बताया जाता है कि बचपन में लीला की तबीयत अक्सर खराब रहती थी। बीमारी के बाद उनकी मां ने उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए खेल और व्यायाम की ओर प्रेरित किया। यही प्रेरणा आगे चलकर भारतीय खेल इतिहास का हिस्सा बन गई। दिलचस्प बात यह भी है कि मां-बेटी की यह जोड़ी बाद में कई डबल्स मुकाबले भी साथ खेली और सफलता हासिल की।
आज के दौर में किसी भारतीय महिला खिलाड़ी का अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भाग लेना सामान्य बात लग सकती है, लेकिन 1930 के दशक में हालात बिल्कुल अलग थे। भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और खेल के अवसर सीमित थे। खेलों को महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। परिवार और समाज की सोच भी काफी रूढ़िवादी थी।
विदेश जाकर खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना तो अधिकांश भारतीय महिलाओं के लिए लगभग असंभव माना जाता था।
ऐसे दौर में लीला रो दयाल का टेनिस खेलना, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना और फिर विंबलडन जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। उन्होंने केवल अपने लिए रास्ता नहीं बनाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक नई दिशा तय की।
साल 1934 भारतीय महिला खेल इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। विंबलडन के महिला एकल मुख्य ड्रॉ में लीला रो दयाल भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह भारतीय खिलाड़ी इतिहास रचने वाली है। पहले दौर में उनका मुकाबला ब्रिटेन की खिलाड़ी ग्लैडिस साउथवेल से था।
विदेशी माहौल, अनुभवी प्रतिद्वंद्वी और बड़े मंच का दबाव, हर चुनौती उनके सामने मौजूद थी। लेकिन लीला ने आत्मविश्वास और शानदार खेल का परिचय देते हुए मुकाबला जीत लिया। इस जीत के साथ वे विंबलडन में एकल मुकाबला जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं।
आज यह उपलब्धि सामान्य लग सकती है, लेकिन 1934 के भारत के संदर्भ में इसका महत्व असाधारण था। यह केवल एक टेनिस मैच की जीत नहीं थी, बल्कि भारतीय महिलाओं की क्षमता का वैश्विक मंच पर पहला बड़ा प्रदर्शन था। हालांकि दूसरे दौर में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी पहली जीत इतिहास में दर्ज हो चुकी थी।
करीब 90 साल बाद लीला रो दयाल का नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बना। दरअसल, 'कौन बनेगा करोड़पति' (KBC) सीजन 16 में उनसे जुड़ा एक सवाल एक करोड़ रुपये के लिए पूछा गया था। यह सवाल 22 अगस्त 2024 को राजस्थान की प्रतियोगी नरेशी मीना से पूछा गया था।
अमिताभ बच्चन ने सवाल किया, 'लीला रो दयाल किसे हराकर विंबलडन टेनिस चैंपियनशिप में एकल मैच जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं?'
इस सवाल का सही जवाब था- 'ग्लैडिस साउथवेल।'
नरेशी मीना इस सवाल का उत्तर नहीं दे पाईं और उन्होंने खेल छोड़ने का फैसला किया। वे 50 लाख रुपये जीतकर घर लौटीं। लेकिन इस सवाल के बाद लीला रो दयाल का नाम अचानक देशभर में चर्चा का विषय बन गया। हजारों लोगों ने पहली बार उनके बारे में पढ़ा और जाना कि भारतीय महिला टेनिस की शुरुआत किन खिलाड़ियों ने की थी।
विंबलडन केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि टेनिस की सबसे प्रतिष्ठित परंपरा माना जाता है। 1877 में शुरू हुआ यह दुनिया का सबसे पुराना टेनिस टूर्नामेंट है। घास के कोर्ट पर खेले जाने वाला यह ग्रैंड स्लैम अपनी परंपराओं, अनुशासन और इतिहास के लिए प्रसिद्ध है।
सफेद ड्रेस कोड, सेंटर कोर्ट का माहौल, शाही परिवार की मौजूदगी और खेल का सर्वोच्च स्तर इसे दुनिया के बाकी टूर्नामेंटों से अलग बनाता है। दुनिया का लगभग हर टेनिस खिलाड़ी अपने करियर में एक बार विंबलडन जीतने का सपना देखता है। ऐसे टूर्नामेंट में 1934 में किसी भारतीय महिला का मैच जीतना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी।
लीला रो दयाल की पहचान केवल टेनिस तक सीमित नहीं रही। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य पर गंभीर अध्ययन किया और इस विषय पर लेखन भी किया। भारतीय संस्कृति और कला के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन इस बात का उदाहरण था कि खेल और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
भारत में टेनिस की चर्चा होती है तो अक्सर रामनाथन कृष्णन, विजय अमृतराज, लिएंडर पेस, महेश भूपति, सानिया मिर्जा और रोहन बोपन्ना जैसे नाम सामने आते हैं। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां निस्संदेह महान हैं, लेकिन भारतीय टेनिस की शुरुआती नींव रखने वालों में लीला रो दयाल का नाम भी उतनी ही प्रमुखता से लिया जाना चाहिए।