
अपराधी से सच उगलवाने के तरीके नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट। ( फोटो डिजाइन :पत्रिका)
Lie Detector Tests: जब कोई बड़ा क्राइम होता है और सुबूत नहीं मिलते तो पुलिस के पास 3 साइंटिफिक टेस्ट का ऑप्शन होता है: नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट। आम लोग इन्हें लाइ डिटेक्टर टेस्ट कह कर तीनों को एक ही टेस्ट समझ लेते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस, कानून और फोरेंसिक साइंस के नजरिये से ये तीनों बिल्कुल अलग-अलग हैं। आज 2026 में ऑक्सफोर्ड और दिल्ली हाईकोर्ट से लेकर एम्स तक इन टेस्ट की विश्वसनीयता पर बहस चल रही है। सवाल ये है कि क्या ये सच में सच बता सकते हैं? और क्या किसी इंसान की मर्जी के बिना ये टेस्ट करवाना कानूनी है? सुप्रीम कोर्ट 2010 के अनुसार बिना सहमति टेस्ट नहीं हो सकता। आइए मेडिकल जर्नल और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर इसे समझते हैं।
नार्को, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट को ऐसे समझें। डिजाइन: ChatGPT)
थ्योरी: जब कोई व्यक्ति झूठ बोलता है तो उसे तनाव होता है। इस तनाव से उसका आटोमैटिक नर्वस सिस्टम (स्वतंत्र तंत्रिका प्रणाली) एक्टिव होता है। इससे बीपी बढ़ता है, पसीना आता है। मशीन शरीर में इन्हीं बदलावों को पकड़ती है।
टेस्ट टाइम:1.5 से 3 घंटे
टेस्ट कौन करता है: ट्रेंड फोरेंसिक साइकोलॉजिस्ट।
अमेरिकन साइकोलाजिकल एसोसिएशन 2004 की रिपोर्ट के अनुसार पॉलीग्राफ की एक्यूरेसी 70% से 90% के बीच मानी जाती है। लेकिन नेशनल एकेडमी आफ साइंस यूएसए 2003 ने कहा इसकी साइंटिफिक वैधता सीमित है क्योंकि झूठ और तनाव को अलग करना मुश्किल है
क्या होता है: इसमें व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कर के सोडियम पेंटोथल या सोडियम एमिटॉल नामक दवा का इंजेक्शन दिया जाता है। इसे ट्रुथ सीरम भी कहते हैं।
थ्योरी: ये दवा ब्रेन के फ्रंटल लोब को सुन्न कर देती है। फ्रंटल लोब ही है जो हमें सोच कर झूठ बोलने में मदद करता है। जब ये हिस्सा दब जाता है तो व्यक्ति अवचेतन मन की बातें बोलने लगता है।
टेस्ट टाइम: 3-4 घंटे। व्यक्ति अर्ध-निद्रा / टिवलाइट स्टेज में रहता है।
टेस्ट कौन करता है: एनेस्थीसिया एक्सपर्ट + साइकोलॉजिस्ट + वीडियोग्राफी।
इंडियन जर्नल आफ मेडिकल इथिक्स 2011 के अनुसार सोडियम पेंटोथल बार्बीचुरेट ग्रुप की दवा है जो सेंट्रल नर्वस सिस्टम को डिप्रेस करती है। जर्नल आफ फॅारेंसिक एंड लीगल मेडिसिन 2010 में लिखा है कि नार्को से मिली जानकारी 100% सच ही हो ये जरूरी नहीं। व्यक्ति भ्रम, सपनों और सच सब मिला कर बोल सकता है।
इसका पूरा नाम: ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल या पी 300 टेस्ट है।
ये टेस्ट क्या होता है: व्यक्ति के सिर पर 20-30 इलेक्ट्रोड लगे कैप पहनाई जाती है। फिर उसे क्राइम से जुड़े फोटो, शब्द, नाम सुनाए/दिखाए जाते हैं। उस वक्त मशीन दिमाग की बिजली की तरंगें नापती है।
थ्योरी: न्यूरोसाइंस कहती है कि अगर आपने कोई चीज देखी या की है तो आपके दिमाग में उसकी मेमोरी ट्रेस होती है। जब वही शब्द/फोटो आपके सामने आएगा तो आपके ब्रेन में पी 300 वेव नाम की एक विशेष तरंग 300 मिली सेकंड में पैदा होगी। अगर आपने वो चीज नहीं देखी तो ये तरंग नहीं आएगी। मतलब आप मुंह से कुछ भी बोलें, दिमाग सच बता देगा।
टेस्ट टाइम: 45 मिनट से 1.5 घंटे
टेस्ट कौन करता है: न्यूरोलॉजिस्ट व फोरेंसिक एक्सपर्ट।
मेडिकल रेफरेंस: इंटरनेशनल जर्नल आफ साइकोलॉजी 2008 में पी 300 को गिल्टी नॉलेज आफ टेस्ट का सबसे भरोसेमंद बायोमार्कर माना गया है। एम्स दिल्ली के फोरेंसिक विभाग ने 2009 में इसे भारत में पहली बार कोर्ट में मान्य करवाया था।
नार्को, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट की तुलना। ( डिजाइन: Gemini AI)
ये सबसे जरूरी हिस्सा है।
11 मई 2010: श्रीमती सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य, एआईआर 2010 सुप्रीम कोर्ट 1974
सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया:
नतीजा: बिना किसी व्यक्ति की लिखित सहमति के ये तीनों टेस्ट नहीं कराए जा सकते। अगर सहमति से भी कराए जाएं तो रिपोर्ट को सीधा सुबूत नहीं माना जाएगा। ये सिर्फ इनवेस्टिगेशन में मदद के लिए सुराग हो सकते हैं।
अपवाद: अगर कोर्ट खुद आदेश दे और व्यक्ति सहमत हो तो तभी ये टेस्ट हो सकता है। इसीलिए आजकल पुलिस ये टेस्ट करवाने से पहले कोर्ट से परमिशन और आरोपी की सहमति लेती है।
फायदे: नॉन-इनवेसिव है, सस्ता है, जल्दी होता है।
नुकसान:साइकोफिजियोलॉजी जर्नल 2005 के अनुसार अपना बचाव कर के इसे धोखा दिया जा सकता है। जैसे पैर की उंगली दबाना, जीभ काटना। साथ ही झूठ बोलने वाला साइकोपैथ इसमें पास भी हो सकता है, क्योंकि उसे तनाव ही नहीं होता
फायदे: व्यक्ति बहुत सारी नई जानकारी दे देता है जो वो छिपा रहा था। आरुषि केस, निठारी केस में इससे मदद मिली।
नुकसान: सबसे खतरनाक। लैंसेट न्यूरोलॉजी 2006 में बताया गया कि बार्बीचुरेट से सांस रुकना, बीपी गिरना, एलर्जी और 0.01% केस में मौत भी हो सकती है। साथ ही व्यक्ति सम्मोहन अवस्था में झूठी याद भी बना लेता है - इसे फाल्स मेमोरी कहते हैं।
फायदे: ये सबसे वैज्ञानिक है। इसमें दवा नहीं लगती। क्लिनिकल न्यूरोफिजियोलॉजी 2011 में इसे सबसे ऑब्जेक्टिव माना गया है।
नुकसान: ये टेस्ट महंगा है। अगर व्यक्ति को क्राइम के बारे में न्यूज से पता चल गया तो वो भी पी 300 देगा। साथ ही दिमागी बीमारी वाले लोगों में इस टेस्ट का रिजल्ट गलत आ सकता है।
इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ पुलिस चीफ्स, 2022 का मानना है कि पॉलीग्राफ को स्क्रीनिंग टूल की तरह यूज करो, जजमेंट टूल की तरह नहीं। वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन की हेलसिंकी डिक्लेरेशन है कि किसी भी इंसान पर मेडिकल प्रोसीजर उसकी पूरी जानकारी और सहमति के बिना नहीं होना चाहिए। एम्स दिल्ली पूर्व फोरेंसिक विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीर गुप्ता का मानना है कि नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ तीनों टेस्ट मैजिक नहीं हैं। ये केवल दिशा देते हैं। अंतिम सच कोर्ट और फिजिकल सुबूत ही तय करते हैं।
देश के मशहूर न्यूरो सर्जन डॉ. नगेंद्र शर्मा ने बतौर एक्सपर्ट तीनों फॉरेंसिक टेस्ट्स के बारे में बताया। (फोटो: पत्रिका)
नार्को, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए पुलिस आरोपी से घुमा-फिराकर सवाल पूछती है, जिनमें 90% सवाल सीधे केस से जुड़े होते हैं। पॉलीग्राफ टेस्ट में झूठ बोलने पर बढ़ने वाली दिल की धड़कन, सांस की रफ्तार और शारीरिक तनाव (असामान्य गतिविधि) को रिकॉर्ड किया जाता है। ब्रेन मैपिंग टेस्ट में आरोपी से बिना कुछ कहे उसकी केवल मस्तिष्क की तरंगों के जरिये यह पता लगाया जाता है कि उसके दिमाग में अपराध की कोई पुरानी याद या छिपी गतिविधि है या नहीं। खास बात यह है कि इन टेस्ट्स में आरोपी सीधे तौर पर अपना अपराध स्वीकार नहीं करता और न ही किसी का नाम लेता है, बल्कि वह केवल घटनाक्रम के बारे में बताता है। यही वजह है कि इनसे मिलने वाले अप्रत्यक्ष सुबूतों (इनडायरेक्ट एविडेंस) के 90% जवाब बिल्कुल सटीक होते हैं, जो जांच को सही दिशा देते हैं।
-डॉ. नगेंद्र शर्मा, मशहूर न्यूरो सर्जन व न्यूरो एक्सपर्ट, जोधपुर।
Updated on:
15 Jul 2026 03:33 pm
Published on:
15 Jul 2026 03:33 pm
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