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सोनम वांगचुक का अनशन: 8 भारतीय जिनकी भूख हड़ताल से हुई थी मौत, Hunger Strike से डेथ कैसे होती है, समझिए

Sonam Wangchuk Hunger Strike : दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन बीच उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर भी खबरें आ रही हैं। इतिहास गवाह है कि अब तक करीब 8 भारतीय भूख हड़ताल के कारण जान गंवा चुके हैं।
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Jul 15, 2026
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Sonam Wangchuk अनशन पर | Credit- CJP

Sonam Wangchuk Hunger Strike : दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे हैं। 28 जून 2026 से शुरू हुआ यह 'आंदोलनकारी उपवास' अब अपने 18वें दिन में पहुंच चुका है, और उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 8.5 किलो वजन घट चुका है, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर खतरनाक स्तर तक गिर चुके हैं। दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका भी दाखिल हो चुकी है जिसमें उन्हें जबरन अस्पताल ले जाने और फोर्स-फीड करने की मांग की गई है।

खास बात यह है कि यह उनका पहला अनशन नहीं है। उनके अपने शब्दों में, यह छठी बार है, और इस बार उन्होंने "छह हफ्ते या मृत्यु" तक जाने की कसम खाई है। एक्टर शबाना आजमी, स्वरा भास्कर, नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार उनसे अनशन खत्म करने की अपील कर चुके हैं।

जब भी कोई आंदोलनकारी अन्न का त्याग करता है, इतिहास के पन्ने खुद खुल जाते हैं। भारत में अपनी मांगों के लिए जान दांव पर लगाने का लंबा इतिहास रहा है। आइए, तथ्यों की पुष्टि के साथ जानते हैं उन 8 भारतीयों की कहानी जिन्होंने अनशन में प्राण गंवाए, और विज्ञान की नजर से समझते हैं कि भूख हड़ताल शरीर के साथ क्या करती है।

मौत का ट्रेल: 8 आंदोलनकारी जिन्होंने अनशन में प्राण त्यागे

  1. जतिन दास (1929, लाहौर जेल) : राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए 13 जुलाई से शुरू हुआ अनशन 63वें दिन, 13 सितंबर 1929 को उनकी मृत्यु पर खत्म हुआ। वे मात्र 24 वर्ष के थे। जबरन खिलाने की कोशिशों ने उनके फेफड़ों को नुकसान पहुंचाया; अंततः लगातार भूख और शारीरिक क्षय से उनका निधन हुआ। पांच लाख से अधिक लोग उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे।
  2. महावीर सिंह (1933, अंडमान सेल्युलर जेल) : 12 मई 1933 को जेल में 30 से अधिक राजनीतिक कैदियों के साथ शुरू हुए सामूहिक अनशन में शामिल महावीर सिंह को पांचवें-छठे दिन जबरन दूध पिलाने की कोशिश की गई। दूध उनके फेफड़ों में चला गया, और 17-18 मई 1933 को उनकी मृत्यु हो गई।
  3. मोहन किशोर नामदास (1933, अंडमान सेल्युलर जेल) : इसी सामूहिक अनशन में शामिल नामदास की मृत्यु 26 मई 1933 को हुई। कारण था जबरन खिलाए जाने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घटना, जिसके चलते निमोनिया हो गया।
  4. मोहित मैत्रा/मोइत्रा (1933, अंडमान सेल्युलर जेल) : महावीर सिंह और नामदास के साथ ही अनशन पर बैठे मोहित मैत्रा की मृत्यु 28 मई 1933 को हुई, फिर से जबरन खिलाए जाने की क्रूर प्रक्रिया के दौरान। तीनों की मौत ने अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता को देश के सामने उजागर कर दिया था।
  5. पोट्टी श्रीरामुलु (1952, मद्रास) : तेलुगु भाषियों के लिए अलग राज्य आंध्र प्रदेश की मांग को लेकर 19 अक्टूबर 1952 से शुरू अनशन 56वें दिन, 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु पर खत्म हुआ। उनकी मौत के बाद भड़के दंगों के दबाव में नेहरू सरकार ने चार दिन बाद अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा कर दी।
  6. शंकरलिंगनार (1956, विरुधुनगर) : मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिल भाषियों के लिए 'तमिलनाडु' करने की मांग (उनकी 12 मांगों में से एक) को लेकर 27 जुलाई 1956 को शुरू हुआ उनका अनशन 76 दिन बाद, 13 अक्टूबर 1956 को उनकी मृत्यु पर समाप्त हुआ। गौरतलब है कि उस समय राज्य का नाम अब भी 'मद्रास स्टेट' ही था - 'तमिलनाडु' नाम बारह साल बाद, 1969 में जाकर आधिकारिक हुआ।
  7. दर्शन सिंह फेरुमान (1969, अमृतसर) : चंडीगढ़ को पंजाब में शामिल करने और सिख नेताओं द्वारा की गई अरदास (प्रतिज्ञा) की मर्यादा बचाने के लिए 15 अगस्त 1969 को अमृतसर जेल में शुरू उनका अनशन 74वें दिन, 27 अक्टूबर 1969 को उनकी मृत्यु पर समाप्त हुआ।
  8. प्रो. जी. डी. अग्रवाल / स्वामी सानंद (2018, ऋषिकेश AIIMS) : IIT कानपुर के पूर्व प्रोफेसर ने गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए एक कानून बनाने की मांग को लेकर 22 जून 2018 को हरिद्वार में अनशन शुरू किया। 111वें दिन, 11 अक्टूबर 2018 को दिल का दौरा पड़ने से AIIMS ऋषिकेश में उनका निधन हुआ, जहां उन्हें अंतिम दिनों में जबरन भर्ती कराया गया था।

शोध का खुलासा: कैसे होती है Hunger Strike से मौत?

फोरेंसिक मेडिसिन के शोध पत्रों के मुताबिक, जिसमें भूख हड़ताल में हुई मौतों के पोस्टमॉर्टम अध्ययन शामिल हैं - मृत्यु सिर्फ 'भूखा रहने' से नहीं, बल्कि मल्टी-ऑर्गन फेलियर से होती है, जिसमें गंभीर संक्रमण (सेप्सिस) और हृदय की अनियमित धड़कन (वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन) भी शामिल हो सकते हैं। यह प्रक्रिया चरणों में चलती है:

शरीर से फैट का पिघलना (शुरुआती 2-3 हफ्ते)

शरीर सबसे पहले लिवर में जमा शुगर (ग्लाइकोजन) को करीब 24-48 घंटों में इस्तेमाल कर लेता है, फिर 'कीटोसिस' अवस्था में जाकर ऊर्जा के लिए फैट पिघलाना शुरू करता है। यही कारण है कि शुरुआती हफ्तों में वजन तेजी से गिरता है - काफी हिस्सा पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी से भी होता है।

मांसपेशियों का गलना (3 हफ्ते के बाद)

फैट भंडार घटने पर शरीर अपनी मांसपेशियों के प्रोटीन को तोड़कर ऊर्जा जुटाने लगता है। एक महीने के बाद या करीब 18% वजन घटने पर शरीर को स्थायी नुकसान शुरू हो सकता है - निगलने में दिक्कत, सुनने-देखने की क्षमता प्रभावित होना, अंगों का काम धीमा पड़ना।

अंगों का सिकुड़ना (अंतिम चरण)

पोस्टमॉर्टम अध्ययनों में लिवर, पैनक्रियाज और हृदय की मांसपेशियों तक में सिकुड़न (atrophy) पाई गई है। शोध बताते हैं कि 45 दिनों के बाद संक्रमण या हृदय गति रुकने से मौत का खतरा काफी बढ़ जाता है। यदि पानी भी पूरी तरह बंद कर दिया जाए तो यह प्रक्रिया कहीं तेज़ हो जाती है - किडनी तीसरे दिन तक ही जवाब देना शुरू कर सकती है।

लंबी भूख हड़ताल के बाद खाना भी खतरनाक

चिकित्सकीय समझ के मुताबिक जब शरीर का वजन बहुत ज्यादा (व्यापक रूप से करीब एक-तिहाई तक) घट जाता है, तब शरीर के अंग इतने कमजोर पड़ चुके होते हैं कि भोजन या ग्लूकोज को ठीक से पचा नहीं पाते। इस स्थिति में अचानक दोबारा खिलाना भी खतरनाक हो सकता है। इसीलिए लंबी भूख हड़ताल के बाद मेडिकल निगरानी में ही आहार दोबारा शुरू किया जाता है।

Updated on:
15 Jul 2026 04:36 pm
Published on:
15 Jul 2026 02:55 pm