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Granular Urea vs Nano Urea : नैनो यूरिया पर बड़ा सवाल, आखिर किल्लत के बाद भी किसान दानेदार यूरिया छोड़ने को तैयार क्यों नहीं?

Granular Urea vs Nano Urea : सरकारी प्रयासों और इफको के दावों के बावजूद भारतीय किसान दानेदार यूरिया छोड़कर नैनो यूरिया अपनाने से क्यों कतरा रहे हैं? जानिए इसके पीछे की जमीनी हकीकत और वैज्ञानिकों की राय।
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Jul 16, 2026
Granular Urea vs Nano Urea
Granular Urea vs Nano Urea : किसान दानेदार यूरिया की जगह क्यों नहीं अपना पा रहे नैनो यूरिया, PC- Patrika

सरकार, इफको और कई कृषि संस्थान पिछले कुछ वर्षों से नैनो यूरिया को खेती में क्रांतिकारी बदलाव बताकर बढ़ावा दे रहे हैं। दावा किया जाता है कि 500 मिलीलीटर की एक बोतल पारंपरिक यूरिया की एक बोरी की जरूरत कम कर सकती है, लागत घटा सकती है और पर्यावरण को भी कम नुकसान पहुंचाती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि भारत के अधिकांश किसान आज भी दानेदार यूरिया पर ही निर्भर हैं। यहां तक कि इफको ने भी माना है कि नैनो उर्वरकों को अपनाने की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। आखिर किसान नैनो यूरिया से दूरी क्यों बना रहे हैं आइए जानते हैं...।

किसान को दिखने वाला असर चाहिए

दानेदार यूरिया डालने के कुछ दिनों बाद फसल में हरियाली साफ दिखाई देती है। किसान वर्षों से इस प्रभाव को देखता आया है। नैनो यूरिया पत्तियों पर स्प्रे किया जाता है और इसका असर हमेशा उतना स्पष्ट नहीं दिखता। कई किसानों का कहना है कि उन्हें फसल में वह "हरापन" नहीं दिखता जो सामान्य यूरिया से मिलता है। इसी वजह से किसान जोखिम लेने से बचते हैं।

क्या नैनो यूरिया...यूरिया की जगह ले सकता है?

यही सबसे बड़ा विवाद है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि नैनो यूरिया तब बेहतर परिणाम देता है जब उसे पारंपरिक यूरिया की कुछ मात्रा के साथ मिलाकर उपयोग किया जाए। लेकिन केवल 50% नाइट्रोजन या उससे कम करके सिर्फ नैनो यूरिया पर निर्भर रहने से कई परिस्थितियों में उत्पादन घट सकता है।

यानी वैज्ञानिक समुदाय में भी यह धारणा मजबूत है कि नैनो यूरिया फिलहाल पूरा विकल्प (Replacement) नहीं बल्कि पूरक (Supplement) की तरह ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

वैज्ञानिकों में क्या है मतभेद

नैनो यूरिया को लेकर वैज्ञानिक जगत दो हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। एक ओर इफको और कुछ परीक्षणों में दावा किया गया कि इससे 3-8% तक उत्पादन बढ़ सकता है और 25-50% तक यूरिया की बचत संभव है।

दूसरी ओर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) सहित कुछ परीक्षणों में उत्पादन और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं मिला। इस संबंध में संसद में भी जानकारी दी गई थी कि कुछ ट्रायल्स में उल्लेखनीय लाभ नहीं दिखे।

किसानों को स्प्रे के लिए करना आसान नहीं होता है। दानेदार यूरिया को खेत में सीधे छिड़का जा सकता है। दानेदार यूरिया को खेत में डालने के लिए किसानों को अधिक मेहनत की जरूरत नहीं होती है। जबकि नैनो यूरिया के लिए स्प्रे मशीन चाहिए, सही समय पर छिड़काव करना पड़ता है, मौसम अनुकूल होना चाहिए, अतिरिक्त मजदूरी लग सकती है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह एक अतिरिक्त झंझट माना जाता है।

खेती में किसान प्रयोग नहीं, भरोसा चाहता है

भारत का किसान आमतौर पर ऐसी तकनीक जल्दी नहीं अपनाता जिससे उत्पादन पर जोखिम हो। अगर एक एकड़ फसल खराब हो जाए तो पूरे सीजन की कमाई प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसान वही उर्वरक चुनता है जिस पर वर्षों का अनुभव और भरोसा हो।

जमीनी ट्रायल्स में मिले मिले-जुले परिणाम

मध्य प्रदेश सहित कई इलाकों में किसानों ने बताया कि नैनो यूरिया इस्तेमाल करने के बाद उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिला। कुछ किसानों ने कहा कि उन्हें उत्पादन या फसल की गुणवत्ता में कोई विशेष अंतर महसूस नहीं हुआ। हालांकि इफको के अपने आंकड़ों में हजारों ट्रायल्स के आधार पर औसतन उत्पादन बढ़ने का दावा किया गया है।

'एक बोतल = एक बोरी' दावे पर भी बहस

नैनो यूरिया के प्रचार में अक्सर कहा जाता है कि 500 मिलीलीटर की एक बोतल 45 किलो यूरिया की एक बोरी के बराबर है। लेकिन, कई वैज्ञानिकों का कहना है कि दोनों का काम करने का तरीका अलग है। दानेदार यूरिया मिट्टी के माध्यम से जड़ों को नाइट्रोजन देता है, जबकि नैनो यूरिया मुख्य रूप से पत्तियों से अवशोषित होता है। इसलिए दोनों की सीधी तुलना हमेशा आसान नहीं है।

फिर सरकार और इफको इसे क्यों बढ़ावा दे रहे हैं?

  • यूरिया सब्सिडी पर सरकारी खर्च कम हो सकता है।
  • नाइट्रोजन की बर्बादी घट सकती है।
  • भूजल और पर्यावरण प्रदूषण कम करने का दावा किया जाता है।
  • परिवहन और भंडारण लागत घटती है।
  • कम मात्रा में ज्यादा दक्षता हासिल करने का लक्ष्य है।

इन प्राकृतिक तरीकों से खेत में बढ़ा सकते हैं नाइट्रोजन

यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों के बिना भी किसान प्राकृतिक तरीकों से फसलों में नाइट्रोजन की कमी को काफी हद तक पूरा कर सकते हैं। इसके लिए हरी खाद के रूप में ढैंचा, सनई और लोबिया जैसी फसलों को खेत में जोतकर मिट्टी में जैविक नाइट्रोजन बढ़ाई जाती है। चना, अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें भी अपनी जड़ों में मौजूद राइजोबियम बैक्टीरिया की मदद से हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी को उर्वर बनाती हैं। इसके अलावा गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत, पंचगव्य और कम्पोस्ट टी जैसे जैविक विकल्प मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ाकर पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार करते हैं।

धान और गेहूं की पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाने, मल्चिंग करने तथा शीशम, सुभबूल और ग्लिरिसिडिया जैसे नाइट्रोजन स्थिर करने वाले पेड़ों को कृषि प्रणाली में शामिल करने से भी मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्राकृतिक तरीके यूरिया की तरह तुरंत नाइट्रोजन नहीं देते, लेकिन लंबे समय में मिट्टी की सेहत सुधारकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Updated on:
16 Jul 2026 06:02 pm
Published on:
16 Jul 2026 06:02 pm