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क्या फिर राजनीति में एंट्री करेंगे उदयभान करवरिया? इलाहाबाद का वो कांड, जब यूपी में पहली बार गूंजी थी AK-47 की तड़तड़ाहट

Karwariya Family Political History : जानिए प्रयागराज के रसूखदार 'करवरिया परिवार' का पूरा राजनीतिक सफर। जिला सहकारी बैंक से लेकर बारा और मेजा विधानसभा सीटों पर जीत, भाइयों की जेल और नीलम करवरिया के इतिहास रचने की पूरी कहानी यहां पढ़ें।
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Udaybhan Karwariya

Udaybhan Karwariya : उदयभान करवरिया क्या फिर से राजनीति में होंगे सक्रिय, PC- Patrika

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर उदयभान करवरिया का नाम चर्चा में है। प्रयागराज और कौशांबी के राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या समय से पहले रिहाई के बाद उदयभान करवरिया फिर सक्रिय राजनीति में वापसी करेंगे?

इस चर्चा के पीछे 29 साल पुराना वह हत्याकांड है जिसने न सिर्फ इलाहाबाद बल्कि पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। 13 अगस्त 1996 को समाजवादी पार्टी के विधायक जवाहर यादव उर्फ जवाहर पंडित की सिविल लाइंस इलाके में दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। इस घटना को उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित राजनीतिक हत्याकांडों में गिना जाता है।

कौन थे जवाहर पंडित?

जवाहर यादव, जिन्हें लोग जवाहर पंडित के नाम से जानते थे, मूल रूप से जौनपुर के रहने वाले थे। उन्होंने मजदूरी से अपना जीवन शुरू किया और बाद में शराब तथा बालू कारोबार में बड़ा नाम बनाया।

1993 में वह झूंसी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए। उस समय उनकी पहचान सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के करीबी नेताओं में होती थी। प्रयागराज और आसपास के इलाकों में उनका मजबूत राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव था।

क्या हुआ था 13 अगस्त 1996 को?

13 अगस्त 1996 की शाम जवाहर पंडित अपनी मारुति कार से सिविल लाइंस क्षेत्र से गुजर रहे थे। अचानक एक टाटा सिएरा और एक मारुति वैन ने उनकी गाड़ी को घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हमलावरों के हाथों में रायफल, रिवॉल्वर और AK-47 थी। इसके बाद कार पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई। कुछ ही सेकंड में जवाहर पंडित को कई गोलियां लगीं और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

बताया जाता है कि यह पहली बार था जब इलाहाबाद की सड़कों पर खुलेआम AK-47 से फायरिंग की गई थी। इसी वजह से यह घटना लंबे समय तक प्रदेश की सबसे चर्चित आपराधिक घटनाओं में शामिल रही।

क्यों हुई थी हत्या?

जांच और अदालत में सामने आए तथ्यों के अनुसार इस हत्याकांड की जड़ में बालू खनन के ठेके और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई थी। एक तरफ जवाहर पंडित का बढ़ता प्रभाव था तो दूसरी तरफ कौशांबी और प्रयागराज क्षेत्र में करवरिया परिवार भी खनन कारोबार और राजनीति में मजबूत पकड़ रखता था। दोनों पक्षों के बीच वर्षों से चली आ रही अदावत आखिरकार खूनी संघर्ष में बदल गई।

कौन हैं उदयभान करवरिया?

उदयभान करवरिया कौशांबी के प्रभावशाली ब्राह्मण राजनीतिक परिवार से आते हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर दो बार विधायक रह चुके हैं। उदयभान करवरिया उत्तर प्रदेश की बारा विधानसभा सीट से 2002 और 2007 में लगातार दो बार विधायक चुने गए थे। करवरिया परिवार के अन्य सदस्य भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। कपिल मुनि करवरिया बसपा से सांसद रहे। सूरजभान करवरिया विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) रहे। नीलम करवरिया उदयभान की पत्नी हैं और भाजपा विधायक रह चुकी हैं।प्रयागराज-कौशांबी क्षेत्र में करवरिया परिवार को लंबे समय से प्रभावशाली राजनीतिक परिवार माना जाता है।

जवाहर पंडित हत्याकांड के करवरिया ब्रदर्स थे आरोपी

जवाहर पंडित की हत्या के बाद उनके भाई सुलाकी यादव ने उदयभान करवरिया, कपिल मुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। मामले की जांच बाद में सीबी-सीआईडी को सौंपी गई।

करीब दो दशक तक मुकदमा चलता रहा। आखिरकार 31 अक्टूबर 2019 को अदालत ने उदयभान करवरिया, कपिल मुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी को दोषी करार दिया। 4 नवंबर 2019 को सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और जुर्माना भी लगाया गया।

करवरिया परिवार का राजनीतिक सफर

वर्ष 1997 में उदयभान करवरिया ने कौशांबी जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद की कमान संभाली। इसके बाद साल 2000 में हुए पंचायत चुनाव में उनके बड़े भाई कपिल मुनि करवरिया ने जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीतकर परिवार के राजनीतिक प्रभाव को और मजबूत किया।

साल 2002 के विधानसभा चुनाव में उदयभान करवरिया ने इलाहाबाद की बारा विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस जीत के साथ उन्होंने पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया। पांच साल बाद 2007 में भाजपा ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया और बारा सीट से मैदान में उतारा। उदयभान लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए। खास बात यह रही कि उस चुनाव में इलाहाबाद जिले की 12 विधानसभा सीटों में भाजपा को केवल बारा सीट पर ही जीत मिली थी।

हालांकि, परिसीमन के बाद 2012 में बारा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। इसके बाद उदयभान ने इलाहाबाद उत्तरी सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

सपा सरकार बनने के बाद तेज हुई कानूनी कार्रवाई

2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद जवाहर पंडित हत्याकांड की सुनवाई में तेजी आई। वर्ष 2013 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई पर लगी रोक को हटा दिया। इसी दौरान लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहे उदयभान करवरिया के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ।

वारंट जारी होने के बाद उदयभान करीब दो महीने तक फरार रहे। अंततः 1 जनवरी 2014 को उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया। बाद में उनके भाई कपिल मुनि करवरिया और सूरजभान करवरिया को भी जेल जाना पड़ा।

तीनों भाइयों के जेल में होने के बाद भाजपा ने करवरिया परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उदयभान की पत्नी नीलम करवरिया को मेजा विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। नीलम करवरिया ने चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया और भाजपा को पहली बार इस सीट पर जीत दिलाई।

2024 में उदयभान करवरिया की हुई थी रिहाई

2024 में उदयभान करवरिया को अच्छे आचरण के आधार पर समय पूर्व रिहा कर दिया गया। उनकी रिहाई के बाद एक बार फिर क्षेत्र की राजनीति में उनकी सक्रियता को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं। हालांकि, जवाहर पंडित की पत्नी और पूर्व विधायक विजमा यादव लगातार इस रिहाई का विरोध करती रही हैं। उनका कहना है कि रिहाई नियमों के अनुरूप नहीं हुई।

विजमा यादव की राजनीतिक यात्रा

पति की हत्या के बाद विजमा यादव ने राजनीति में कदम रखा। 1996 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें झूंसी से टिकट दिया और वह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं। इसके बाद भी उन्होंने कई चुनाव लड़े और क्षेत्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने पति की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया और न्याय की लड़ाई भी जारी रखी।