हुसैन बंधु कभी साइकिल की पंक्चर निकाला करते थे, तो कभी नगीने घिसाई करते। उस दौरान इन्होंने अपना घर खर्च चलाने के लिए दीवारों पर पेंट भी किया।
‘फूलो में तुल रहा हूं, तो हैरान ना कीजिए, मैंने सुलगती रेत पर पत्थर भी ढोए हैं।’ इस शेर को गजल सिंगर अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन ने अपने जीवन का सार बताया है। देश के नामचीन गजल सिंगर्स के साथ परफॉर्म कर चुके हुसैन बुंधओं ने पत्रिका से बात करते हुए बताया कि हमारा जन्म संगीत परिवार में हुआ है, जहां नाना, पिता, चाचा सहित अधिकांश रिश्तेदार संगीत की पूजा करते हैं। सच मायने में हमारे खून में संगीत समाया हुआ है। हमारी संगीत की शिक्षा वालिद उस्ताद अफजल हुसैन से मिली है। पहली शिक्षा शास्त्रीय संगीत की रही और इसके बाद सुगम संगीत की तरफ दायरा बढ़ाया। जब हमने संगीत सीखने का मन बनाया तो, पिता ने मां से कहा था कि दोनों बच्चों को मेरे पास बेटों के रूप में नहीं शिष्यों के रूप में भेजना, तभी ये असली ज्ञान अर्जित कर पाएंगे।
पिता ने कहा था साथ में गाओगे तो नाम कमाओगे
अहमद हुसैन ने कहा कि मोहम्मद हुसैन से मैं दो साल बड़ा हूं, लेकिन हम हमेशा साथ ही सभी काम किया करते थे। जब हम पिता के पास म्यूजिक सीख रहे थे, तो उन्होंने हमारे गाने के बाद कहा कि तुम दोनों साथ में गाओगे तो खूब नाम कमाओगे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत के साथ सुगम संगीत की भी शिक्षा लेने की प्रेरणा दी। पिताजी आकाशवाणी में म्यूजिक स्टाफ में थे, जब रिटायर हुए तो हम दोनों भाईयों ने पढ़ाई छोडक़र म्यूजिक में ही कॅरियर बनाने का निर्णय लिया।
संगीत का सफर शुरू होने के कुछ साल बाद ही पिताजी को गंभीर बीमारी हो गई, परिवार की आर्थिक स्थिति तो पहले से ही ठीक नहीं थी। एेसे में हम दोनों भाईयों ने म्यूजिक के साथ पार्ट टाइम जॉब भी शुरू किया। कभी हम साइकिल की पंक्चर निकाला करते थे, तो कभी नगीने घिसाई करते। उस दौरान हमने दीवारों पर पेंट भी किया। यदि उस वक्त हम ये काम नहीं करते तो घर में खाने की भी दिक्कतें आ जाती।
सितारा देवी ने दिखाया मुम्बई का रास्ता
मोहम्मद हुसैन ने कहा कि एक बार हम जयपुर में परफॉर्म कर रहे थे, तब वहां सितारा देवी भी आई हुई थी। परफॉर्मेंस के बाद उन्होंने हमंे बहुत प्यार दिया और अपने साथ मुम्बई ले गईं। वहां जाकर हम लोगों से मिलने लगे और अपने गायन से लोगों को जोडऩे लगे। काम तो मिल रहा था, लेकिन पैसा ज्यादा नहीं मिल पा रहा था। इसके चलते हम जयपुर आकर काम करते थे और फिर कुछ पैसे जोडक़र मुम्बई निकल जाया करते थे। यह हमारे स्ट्रगल का दूसरा हिस्सा था। इस दौरान सिताराजी ने हमें कल्याणजी आनंदजी से मिलवाया। 1970 में हमारा एलबम ‘गुलदस्ता’ रिलीज हुआ, इसका प्रजेंटेशन कल्याणजी-आनंदजी का था और म्यूजिक कल्याण विजू शाह का था। यह एलबम हमारा इतना लोकप्रिय हुआ कि हमने फिर पीछे मुडक़र नहीं देखा।