
नागौर. पिछले कुछ वर्षों से रबी और खरीफ के सीजन में यूरिया और डीएपी के लिए किसानों की लंबी कतारें, सहकारी समितियों के बाहर हंगामा और खाद की कमी की शिकायतें आम हो गई हैं। लेकिन विधानसभा में कृषि विभाग की ओर से पेश आंकड़े एक अलग तस्वीर दिखाते हैं। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार प्रदेश में पिछले दो वित्तीय वर्षों में यूरिया और डीएपी की मांग से अधिक आवंटन किया गया। इतना ही नहीं, नागौर और डीडवाना-कुचामन जिलों में भी अधिकांश महीनों में मांग के मुकाबले कहीं अधिक खाद की आपूर्ति की गई। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कागजों में पर्याप्त खाद उपलब्ध है तो किसान हर सीजन में खाद के लिए परेशान क्यों होते हैं।
विधानसभा में विधायक घनश्याम के सवाल के जवाब में कृषि विभाग ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रदेश ने 26.20 लाख मीट्रिक टन यूरिया की मांग की थी, जबकि केन्द्र सरकार ने 29.75 लाख मीट्रिक टन आवंटित किया। डीएपी की मांग 8.50 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले 9.19 लाख मीट्रिक टन आवंटन हुआ। इसी प्रकार वर्ष 2025-26 में 24.83 लाख मीट्रिक टन यूरिया की मांग के मुकाबले 25.74 लाख मीट्रिक टन तथा 8.36 लाख मीट्रिक टन डीएपी की मांग के मुकाबले 9.73 लाख मीट्रिक टन आवंटित किया गया।
नागौर व डीडवाना कुचामन में मांग से अधिक आपूर्ति
केवल प्रदेश ही नहीं, नागौर और डीडवाना-कुचामन जिले के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं। विधानसभा में परबतसर विधायक रामनिवास गावडिय़ा के सवाल के जवाब में कृषि विभाग ने बताया कि रबी 2023-24 के दौरान नागौर जिले में कुल 15,311 मीट्रिक टन की मांग के मुकाबले 24,124 मीट्रिक टन खाद की आपूर्ति दर्ज की गई। डीडवाना-कुचामन में 10,207 मीट्रिक टन की मांग के मुकाबले 16,082 मीट्रिक टन उपलब्ध कराया गया। अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर और जनवरी में दोनों जिलों में मांग से काफी अधिक आपूर्ति रही। हालांकि फरवरी में कुछ कमी दिखाई दी, लेकिन मार्च में फिर आपूर्ति मांग से अधिक रही।
केन्द्र सरकार की गई मांग के विरुद्ध किया गया आवंटन
वित्तीय वर्ष 2024-25 :
यूरिया : मांग - 26.20 , आवंटन - 29.75
डीएपी : मांग - 8.50, आवंटन - 9.19
वित्तीय वर्ष 2025-26 :
यूरिया : मांग - 24.83, आवंटन - 25.74
डीएपी : मांग - 8.36, आवंटन - 9.73
(आंकड़े लाख मीट्रिक टन में)
समस्या आवंटन नहीं, अंधाधुंध उपयोग है
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल आवंटन की नहीं, बल्कि उपयोग के तरीके और वितरण व्यवस्था की भी है। कई किसान अनुशंसित मात्रा से अधिक यूरिया और डीएपी का प्रयोग करते हैं। अधिक उत्पादन की उम्मीद में जरूरत से ज्यादा उर्वरक डालने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जबकि इससे फसल को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। उल्टा मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है, जैविक कार्बन घटता है और सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन बढ़ता है। लगातार रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
बिक्री व्यवस्था सुधारने की जरूरत
सरकार को रबी और खरीफ सीजन की शुरुआत में एक साथ खाद खरीदने की होड़ रोकने, वितरण प्रणाली को और पारदर्शी बनाने तथा वास्तविक खपत के आधार पर मांग का आकलन करने की आवश्यकता है। तभी सरकारी आंकड़ों और किसानों के अनुभव के बीच का यह विरोधाभास दूर हो सकेगा।
टॉपिक एक्सपर्ट - संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना चाहिए
किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना चाहिए। डीएपी के विकल्प के रूप में एनपीके और एसएसपी जैसे उर्वरकों का भी वैज्ञानिक तरीके से उपयोग बढ़ाना होगा। साथ ही उर्वरकों के स्टॉक की प्रवृत्ति से बचना चाहिए और नैनो यूरिया व डीएपी के उपयोग को भी बढ़ाना चाहिए।
- शंकरराम सियाक, सहायक निदेशक, कृषि विभाग, नागौर